Thursday, April 30, 2020

दुखों का नाश करने वाला योग - 1st April 2020

व्यावहारिक गीता उपदेश


आजकल हम सब अपने अपने घरों के अंदर अपना जीवन यापन कर रहे हैं जो कि अगले 15 दिनों तक ऐसा ही चलता रहेगा । गीता अध्ययन करना उत्तम हो सकता है:

हमारे कार्य केवल खाना, पीना, सोना, जागना, पढ़ना तक ही सीमित रह गया है इस विषय में भगवान गीता के आत्म संयम योग नामक अध्याय 6 के 17 में श्लोक में हमारा मार्गदर्शन करते हुए कहते हैं:


युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावनोधस्य योगों भवति दुःखहां ।।  🍄🙏🍄

दुखों का नाश करने वाला योग तो यथा योग्य खाने वाले को अर्थात अपने शरीर की शक्ति के अनुसार यदि हम खाते हैं तब वह रक्षा करता है ,कष्ट नहीं देता, उससे अधिक लेते हैं तब वह कष्ट देता है और जो प्रमाण से कम होता है वह रक्षा नहीं करता। शंकर भाष्य में कहा है कि पेट का आधा भाग अर्थात दो हिस्से तो भोजन द्वारा और तीसरा हिस्सा जल  से पूर्ण करना चाहिए तथा चौथा हिस्सा वायु के आने जाने के लिए खाली रखना चाहिए । अतः सर्वप्रथम घर में रहते हुए अपने भोजन पर विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि हम स्वस्थ रह सकें।

            भोजन के पश्चात भगवान ने विहार अर्थात चलना फिरना रूप ,जो पैरों की क्रिया है उस पर ध्यान दिलाया है । हमें यथा योग्य चलते फिरते भी रहना चाहिए  जो आवश्यक एवं हितकर है । आज की परिस्थिति में तो घर के अंदर ही घूम फिर सकते हैं । बाद में यथा योग्य बिहार भी अपनी दैनिक चर्या में सम्मिलित कर सकते हैं।

          भगवान ने तीसरी चीज कर्मों में यथा योग्य चेष्टा,अर्थात  अपनी स्थिति ,अवस्था, वातावरण के अनुसार शरीर निर्वाह के लिए शास्त्र निहित कर्तव्य कर्म करने के विषय में कहा है ,जो हमें बिना राग ,द्वेष और आसक्ति से करते रहना चाहिए । कर्मों का परिमाण भी उतना ही होना चाहिए जितना जिसके लिए आवश्यक हो, जिससे न्याय पूर्वक शरीर निर्वाह होता रहे और ध्यान योग के लिए भी पर्याप्त समय मिल सके।
   
        ऐसा करने से शरीर, इंद्रिय और मन स्वस्थ होते हैं । 

        इसके पश्चात भगवान यथा योग्य सोना और जागने के विषय में कहते हैं। सोना इतनी मात्रा में हो जिससे जागने के समय निंद्रा आलस्य न आवे । अर्थात जिस सोने और जागने से स्वास्थ्य में बाधा न पड़े ,योग में विघ्न ना आए ऐसे यथा योग्य सोना और जागना चाहिए । आजकल जब हम केवल घर के अंदर ही हैं तब ज्यादा सोकर अपना स्वास्थ्य ना खराब करें इसे यथा योग्य ही रखें और अपना कुछ समय पठन-पाठन स्वाध्याय आज में लगावे, इस समय का भी पूरा सदुपयोग करें । भगवान द्वारा दी गई प्रत्येक परिस्थिति हमारे हित के लिए ही हो ऐसा मान कर उसका लाभ लें।

        भगवान ने गीता के श्लोक में पांच चीजें यथा योग्य आहार, बिहार कर्मचेष्टा, सोना और जागना हमें बताया है। अतः दुखों का नाश करने वाला योग उसी योगी को प्राप्त होता है जो यथा योग्य पांचो चीजों का पालन करता है। हम अपने 24 घंटे के समय का आज के काल और परिस्थिति के अनुसार निर्धारण कर ले ताकि हमारा यह समय भी बिना दुख के व्यतीत हो जाए। इस समय की पूरा होने के पश्चात एक बार फिर से इन पांचों के समय का निर्धारण कर ले ताकि हम बिहार और अपने कर्मों पर थोड़ा और समय दे सकें।


धन्यवाद
बालकृष्ण शर्मा