Tuesday, May 12, 2026

क्रोध पर नियंत्रण करके हम अपना एवं समाज दोनों का भला कर सकते हैं।



आजकल हम देखते है कि प्रत्येक मनुष्य को छोटी-मोटी अनावश्यक बातों पर बहुत जल्दी क्रोध आ जाता है, और उससे समाज में हिंसा, झगड़ा और कभी-कभी एक दूसरे की मृत्यु तक पहुँचकर शांत होता है। उसके बाद केवल पश्चाताप रह जाता है, लेकिन क्रोध के द्वारा जो हमारा और दूसरों का अहित हो सकता था वह तो हो चुका होता है। क्रोध के आने पर हमारी बुद्धि और विवेक ढक जाते है और दूसरों का अनिष्ट करने की वृति हमारे अंदर उत्पन्न हो जाती है। यदि क्रोध के मूल पर विचार करें तब हमारे मन के अंदर जो छिपी हुई इच्छाएं, कामनाएं या स्वार्थ रहता है, उसमें विघ्न आने पर यदि सामने वाला व्यक्ति हमसे कमजोर है तब वह क्रोध के रूप में व्यक्त होता है और यदि वह हमसे बलवान है तब भय के कारण हमारे अंदर दब जाता है और उचित समय आने पर किसी अन्य परिस्थिति जो हमारे मन के अनुकूल नहीं होती तब वह छिपा हुआ भय ही क्रोध के रूप में सामने आ जाता है।

हमारे अंदर रहने वाला क्रोध एक प्रज्वलित अग्नि के समान हमे अशांत बनाये रखता है, और यह हमारे स्वभाव का एक हिस्सा बन जाता है। क्रोध के सूक्ष्म रूप को द्वेष कहते है और यह हमारे अंदर धीमी अग्नि के समान सुलगता रहता है। अतः दूसरों के प्रति क्रोध और द्वेष भाव हमारे सबसे बढ़े शत्रु है। शास्त्र में आता है कि जो मनुष्य काम-क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन कर सकता है अर्थात उसके अनुसार प्रतिक्रिया नहीं करता, वही सुखी है और योगी है। द्वेष हमारे संस्कार में रहता है, क्रोध हमारे मन के अंदर रहता है और उसके कारण हिंसा की क्रिया बाहर समाज में देखी जाती है।

हमारे शरीर में स्थित मन हमारी इन्द्रियों और बुद्धि के बीच में स्थित रहता है। अतः यह इन्द्रियों से प्राप्त बाहरी विषयों का ज्ञान और बुद्धि से प्राप्त ज्ञान और उसका परिणाम दोनों से प्रभावित होता रहता है। इसलिए मन में सदा द्वन्द बना रहने के कारण यह अधिकांशत: अशांत रहता है और ध्यान आदि आंतरिक क्रिया या संसार के बाहरी विषयों में शांति की तलाश करता रहता है। जब हमारा मन, विवेकयुक्त बुद्धि के अनुसार कार्य करता है और काम-क्रोध आदि पर अपना नियंत्रण रखता है तब हम एक शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। और यदि विवेक के स्थान पर हमारी बुद्धि के अंदर कामनाएं प्रवेश कर जाती है तब हमारा मन इच्छाओं के अनुसार कार्य करता है चाहे वह उचित हो या अनुचित। और इच्छा के विपरीत स्थिति आने पर उसके अंदर क्रोध उत्पन्न होता है। ऐसी परिस्थिति में उसे धर्म-अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं रहता, बस वह केवल अपनी इच्छा की पूर्ति करना चाहता है। मनुस्मृति में आता है कि अधर्मी पहले अधर्म से बढ़ता है, फिर उससे अपना भला देखता है, फिर शत्रुओं को जीतता है और फिर जड़ सहित नष्ट हो जाता है।

अत: समाज में हिंसा को कम करने के लिए हमें अपने क्रोधित स्वभाव पर नियंत्रण रखना होगा। क्रोध हमें अंदर से मानसिक तनाव, अनिद्रा की स्थिति के द्वारा नुकसान पहुंचाता है और उसके परिणामस्वरूप हिंसा की क्रिया दूसरों को नुकसान पहुंचाती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सबसे कहते है कि जो मनुष्य इच्छा, भय और क्रोध से सर्वथा रहित है वह सदा मुक्त ही है। कभी-कभी हमारा स्वभाव बन जाता है कि दूसरे मनुष्य हमारी इच्छा के अनुसार चलें या कार्य करें, यदि ऐसा नहीं होता तब हमें क्रोध आता है और हिंसात्मक क्रिया बाहर होती है। अत: अपनी इच्छा पूर्ति के लिए कर्म करने से पूर्व हमें भली भांति अपनी सामर्थ्य, परिणाम, दूसरों का हित-अहित आदि संबंधित विषयों पर भलीभाँति विचार कर लेना चाहिए और उनमें कोई विघ्न आने पर दूसरों पर क्रोध न करते हुए उस विपरीत परिस्थिति पर शांतिपूर्वक विचार करना चाहिए। क्रोध से किसी भी समस्या का हल नहीं निकलता और वह और अधिक जटिल हो जाती है, जिससे हमारा स्वयं का और समाज का अहित ही होता है।

डॉ. बी.के शर्मा

Sunday, June 1, 2025

स्वर्ग और नरक की प्राप्ति कराने वाले कर्मों का वर्णन



महाभारत के अनुशासन पर्व में माता पार्वती भगवान महेश्वर से पूछती है कि किस प्रकार के शील, आचरण, कर्म और दान के द्वारा मनुष्य स्वर्ग में जाता है।

भगवान महेश्वर ने कहा-देवी, जो मनुष्य ब्राह्मणों का सम्मान और दान करता है, दीन दुखी और दरिद्र मनुष्यों को भक्ष्य-भोज्य, अन्न दान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरने के स्थान, धर्मशाला, कुँआ, प्याऊ और बावड़ी आदि बनवाता है, लेने वाले लोगों की इच्छा पूछ पूछकर नित्य देने योग्य वस्तुएं दान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन-धान्य, गौ, खेत और कन्याओं का प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, वह देवलोक में निवास करता है। और पुण्यकर्मों का भोग समाप्त होने पर वहां से मनुष्यलोक में आकर सुख-सामग्रियों से संपन्न उत्तम कुल में जन्म लेता है। उसके पास धन-धान्य की कमी नहीं रहती। दान देने वाले प्राणी ही ऐसे महान सौभाग्य से युक्त होते हैं-यह बात ब्रह्मा जी ने बहुत पहले से ही बता रखी है। दाता पुरुष सबके प्रिय होते हैं।

इनके सिवा बहुत से मनुष्य ऐसे होते हैं जो किसी को कुछ देने में कंजूसी करते हैं। वे मन्दबुद्धि पुरुष ब्राह्मणों के मांगने पर अपने पास धन होते हुए भी कुछ नहीं देते। दीनों, अंधें, दरिद्रों, भिखमंगों और अतिथियों को देखते ही हट जाते हैं। उनके याचना करने पर भी जिह्वा की लोलुपता के कारण अन्न नहीं देते। कभी भी धन, वस्त्र, सुवर्ण, गौ और अन्न की बनी हुई नाना प्रकार की खाद्य वस्तुओं का दान नहीं करते। इस प्रकार के अधर्मी, लोभी, नास्तिक एवं दान से जी चुराने वाले मुर्ख लोग नरक में पड़ते हैं। यदि कालचक्र के फेर से पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं तो निर्धन कुल में ही जन्म लेते हैं। वे हमेशा भूख प्यास का कष्ट सहते हैं, सब लोग उन्हें अपने समाज से बाहर कर देते हैं तथा वे सब प्रकार के भोगों से निराश होकर पापाचार से जीविका चलाते हैं अथवा वे थोड़े से वैभव वाले कुल में उत्पन्न होते और थोड़े से ही भोग भोगते हैं।

इनके सिवा, दूसरे भी ऐसे मनुष्य हैं जो सदा गर्व और अभिमान में फूले और पाप में परायण रहते हैं। जो मूर्ख मार्ग देने योग्य पुरुषों को जाने के लिए मार्ग नहीं देते, गुरु के आने पर प्रेमपूर्वक उनकी पूजा नहीं करते तथा अभिमान और लोभ के वशीभूत होकर सम्माननीय पुरुषों का अपमान एवं वृद्धजनों का तिरस्कार करते हैं, इस प्रकार के आचरण करने वाले सभी लोग नरकगामी होते हैं और जब वे नरक से छुटकारा पाते हैं तो बहुत वर्षों के बाद अत्यन्त निन्दित कुल में जन्म लेते हैं। गुरु और बड़े बूढ़ों का अपमान करने वाले मनुष्यों का मूर्ख और घृणित चाण्डालों के कुल में जन्म होता है।

जिनमें गर्व और अभिमान का नाम नहीं होता, जो देवता और ब्राह्मणों की पूजा करता है, संसार के लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ो को प्रणाम करने वाला, विनयी, मीठे वचन बोलने वाला, सब वर्णों का प्रिय, और सम्पूर्ण प्राणियों का हित करने वाला है, जिसका किसी के साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है जो स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करता तथा सबका सत्कार और पूजन करता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुष को मार्ग देता है, गुरु का यथोचित सत्कार करता और अतिथियों को आमन्त्रित करके उनकी पूजा करता है- ऐसा मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त करता है। फिर वहां का भोग समाप्त होने पर मनुष्य योनि में आकर वह उत्तम कुल में उत्पन्न होता है। वहां सब प्राणी उसका आदर करते हैं और सब लोग उसके सामने मस्तक झुकाते हैं।

इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मों का फल सदा स्वयं ही भोगता है। धर्मात्मा मनुष्य सर्वदा उत्तम कुल, उत्तम जाति और उत्तम स्थान में जन्म लेता है। यह साक्षात ब्रह्मा जी के बताये हुए धर्म का वर्णन किया है। जिस मनुष्य का आचरण क्रूरता से भरा हुआ है, जो समस्त जीवों के लिए भयंकर है, जो हाथ, पैर, रस्सी, डंडे और ढेले से मारकर, खंभे में बांधकर तथा घातक शस्त्रों का प्रहार करके जीव जन्तुओं को सताता और भयावह रूप धरण करके उन पर आक्रमण करता है, ऐसे स्वभाव वाले मनुष्य को नरक में गिरना पड़ता है। और कालचक्र में पड़कर यदि वो मनुष्य योनि में आता है तो अनेकों प्रकार की विघ्न बाधाओं से कष्ट उठाने वाले अधम कुल में उत्पन्न होता है। ऐसा मनुष्य अपने किये हुए कर्मों के अनुसार जगत में नीच समझा जाता है और सब लोग उससे द्वेष रखते हैं।

इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियों के प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिता के समान स्नेह रखता है, किसी के साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियों को वश में किये रहता है, जो हाथ पैर आदि को अपने अधीन रखकर किसी भी जीव को ना उद्वेग में डालता और ना मारता ही है, सब प्राणी जिस पर विश्वास करते हैं, जिसका कर्म मृदु होता है तथा जो सदा ही दयाभाव से युक्त रहता है, ऐसे स्वभाव और आचरण वाला पुरुष स्वर्गलोक के दिव्य भवन में देवताओं की भाँति आनन्दपूर्वक निवास करता है। फिर पुण्यकर्मों के क्षीण होने पर यदि वह मृत्युलोक में जन्म लेता है तो उसके ऊपर बाधाओें का आक्रमण कम होता है। वह निर्भय, सुखी और उद्वेग से रहित जीवन व्यतीत करता है। देवि, यह सज्जन पुरुष का मार्ग है, जहां किसी प्रकार की विघ्न बाधा नहीं आने पाती।

जो मनुष्य धर्म से उपार्जित किये हुए धन को भोगते और सत्यधर्म में परायण रहते हैं, वे स्वर्ग में जाते हैं। जिनके सब प्रकार के संदेह दूर हो गये हैं, जो प्रलय और उत्पत्ति के तत्व को जानने वाले सर्वज्ञ और सर्वदृष्टा है, जिनकी आसक्ति दूर हो गयी है तथा जो मन, वाणी और कर्म से किसी जीव की हिंसा नहीं करते, वे ही पुरुष कर्म-बंधनों से मुक्त होते हैं। उन्हें न धर्म बांधता है न अधर्म। जो कहीं आसक्त नहीं होते, किसी के प्राणों की हत्या से दूर रहते हैं तथा जो सुशील और दयालु हैं, वे भी कर्मों के बन्धन में नहीं पड़ते। जो शत्रु और मित्र को समान समझने वाले हैं, वे जितेन्द्रिय पुरुष कर्मबन्धन से मुक्त हो जाते हैं। जो सब प्राणियों पर दया करने वाले, सबके विश्वासपात्र तथा हिंसामय आचरणों को त्याग देने वाले हैं वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं। जो दूसरों के धन पर ममता नहीं रखते, परायी स्त्री से सदा दूर रहते और धर्म के द्वारा प्राप्त किये हुये अन्न का ही भोजन करते हैं, जिनका दूसरों की स्त्रियों के प्रति माता, बहन और बेटी के समान भाव रहता है, जो सदा अपने ही धन से संतुष्ट रहकर चोरी आदि से दूर रहते हैं, जिन्हें सदा अपने भाग्य का ही भरोसा रहता है, जिनकी इन्द्रियाँ काबू में रहती है तथा जो शील को ही श्रेष्ठ समझकर उसमें स्थित रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्ग में जाते हैं। यह देवताओं का बनाया हुआ मार्ग है। विद्वान पुरुष को सदा ही इसका सेवन करना चाहिए।

जो मनुष्य अपने या दूसरे के लिए हँसी-परिहास में भी झूठ नहीं बोलते, आजीविका, धर्म अथवा किसी कामना के लिए असत्य भाषण नहीं करते, जिनकी वाणी मन को प्रिय लगने वाली, किसी को दुख न पहुँचाने वाली, पापपूर्ण विचारों से रहित तथा स्वागत-सत्कार के भाव से युक्त रहती है तथा जो कभी रुखी, कड़वी और निष्ठुरतापूर्ण बात मुँह से नहीं निकालते, वे सज्जन पुरुष स्वर्ग में जाते हैं। मनुष्यों को इस वाणी के धर्म का सदा सेवन करना चाहिए। विद्वानों को सर्वदा शुभ और सत्य वचन बोलना तथा मिथ्या का त्याग करना उचित है। उपुर्यक्त कर्मों का निष्काम भाव से आचरण करने वाले पुरुष को परमात्मपद की प्राप्ति हो जाती है।

शरीर और आत्मा



शरीर और आत्मा इन दोनों में अत्यन्त भेद है। शरीर की नौ अवस्थाएं गर्भाधन, गर्भवृद्धी, जन्म, बाल्यावस्था, कुमारावस्था, जवानी, अधेड़ अवस्था, बुढ़ापा और मृत्यु है। यह शरीर जीव से भिन्न है। देह, इन्द्रिय, प्राण और मन में स्थित आत्मा ही जब उनका अभिमान कर बैठता है - उन्हें अपना स्वरूप मान लेता है - तब उसका नाम जीव हो जाता है। उस सूक्ष्मातिसूक्ष्म आत्मा की मूर्ति है - गुण और कर्मों का बना हुआ सूक्ष्म शरीर। उसे ही कहीं सूत्रात्मा कहा जाता है और कहीं महतत्त्व। वही कालरूप परमेश्वर के अधीन होकर जन्म-मृत्यु रूप संसार में इधर-उधर भटकता रहता है।

श्रीमद्भागवत पुराण में उद्धव जी भगवान से पूछते हैं कि आत्मा है दृष्टा और शरीर है दृश्य। आत्मा स्वयं प्रकाश है और शरीर है जड़। ऐसी स्थिति में जन्म मृत्यु रूप संसार न शरीर को हो सकता है और न आत्मा को। परन्तु इसका होना भी उपलब्ध होता है, तब यह होता किसको है? आत्मा तो अविनाशी, प्राकृत-अप्राकृत गुणों से रहित, शुद्ध, स्वयंप्रकाश और सभी प्रकार के आवरणों से रहित है तथा शरीर विनाशी, सगुण, अशुद्ध, प्रकाश्य और आवृत्त है। आत्मा अग्नि के समान प्रकाशमान है, तो शरीर काठ की तरह अचेतन। फिर यह जन्म मृत्युरूप संसार है किसे?

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, वस्तुतः संसार का अस्तित्व नहीं है तथापि जब तक देह, इन्द्रिय और प्राणों के साथ आत्मा की संबंध भ्रांति है, तब तक अविवेकी पुरुष को वह सत्य सा स्फुरित है। जैसे स्वप्न में अनेकों विपत्तियाँ आती है पर वास्तव में वे हैं नहीं, फिर भी स्वप्न टूटने तक उनका अस्तित्व नहीं मिटता, वैसे ही संसार के न होने पर भी जो उसमें प्रतीत होने वाले विषयों का चिन्तन करते रहते हैं, उनके जन्म मृत्यु रूप संसार की निवृत्ति नहीं होती। अहंकार ही शोक, हर्ष, भय, क्रोध, लोभ, मोह, स्पृहा और जन्म-मृत्यु का शिकार बनता है। आत्मा से तो इनका कोई संबंध ही नहीं है। वास्तव में मन, वाणी, प्राण और शरीर अहंकार के ही कार्य हैं। यह है तो निर्मूल, परन्तु देवता, मनुष्य आदि अनेक रूपों में इसी की प्रतीति होती है।

आत्मा और अनात्मा (शरीर आदि) के स्वरूप को पृथक पृथक भलीभाँति समझना ही ज्ञान है, क्योंकि विवेक होते ही द्वैत का अस्तित्व मिट जाता है। उसका साधन है तपस्या के द्वारा हृदय को शुद्ध करके वेदादि शास्त्रों का श्रवण करना। अनेकों प्रकार के गुण और कर्मों से युक्त देह, इन्द्रिय आदि पदार्थ पहले अज्ञान के कारण आत्मा से अभिन्न मान लिए गये थे, उनका विवेक नहीं था। अब आत्मदृष्टि होने पर अज्ञान और उसके कार्यों की निवृत्ति हो जाती है। इसलिए अज्ञान की निवृत्ति ही अभिष्ट है। वृत्तियों के द्वारा न तो आत्मा का ग्रहण हो सकता है और न त्याग। जैसे सूर्य उदय होने पर मनुष्य के नेत्रों के सामने से अन्धकार का पर्दा हटा देते हैं, किसी नयी वस्तु का निर्माण नहीं करते, वैसे ही अपने स्वरूप का दृढ़ अपरोक्षज्ञान पुरुष के बुद्धिगत अज्ञान का आवरण नष्ट कर देता है। आत्मा नित्य अपरोक्ष है, उसकी प्राप्ति नहीं करनी पड़ती। वह स्वयंप्रकाश है। उसमें अज्ञान आदि किसी प्रकार के विकार नहीं है। वह जन्मरहित है अर्थात् कभी किसी प्रकार भी वृत्ति में आरूढ़ नहीं होता। इसलिए अप्रमेय है। ज्ञान आदि के द्वारा उसका संस्कार भी नहीं किया जा सकता।

मनुष्यों का मन कर्म संस्कारों का पुँज है। उन संस्कारों के अनुसार भोग प्राप्त करने के लिए उसके साथ पाँच इन्द्रियाँ भी लगी हुई है। इसी का नाम है सूक्ष्म या लिंग शरीर। वही कर्मों के अनुसार एक शरीर से दूसरे शरीर में, एक लोक से दूसरे लोक में आता जाता रहता है। आत्मा इस लिंग शरीर से सर्वथा पृथक है। उसका आना जाना नहीं होता, परन्तु जब वह अपने को लिंग शरीर ही समझ बैठता है, उसी में अहंकार कर लेता है, तब उसे भी अपना आना जाना प्रतीत होने लगता है।

मन कर्मों के अधीन है, वह देखे हुए या सुने हुए विषयों का चिन्तन करने लगता है और क्षण भर में ही उनमें तदाकार हो जाता है तथा उन्हीं पूर्व चिन्तित विषयों में लीन हो जाता है। जब यह जीव किसी भी शरीर को अभेद भाव से मैं के रूप में स्वीकार कर लेता है, तब उसे ही जन्म कहते हैं, वैसे ही जैसे स्वप्नकालीन और मनोरथ कालीन शरीर में अभिमान करना ही स्वप्न और मनोरथ कहा जाता है। यह वर्तमान देह में स्थित जीव जैसे पूर्व देह का स्मरण नहीं करता, वैसे ही स्वप्न या मनोरथ में स्थित जीव भी पहले के स्वप्न और मनोरथ को स्मरण नहीं करता, प्रत्युत उस वर्तमान स्वप्न और मनोरथ में पूर्व सिद्ध होने पर भी अपने को नवीन सा ही समझता है।

काल की गति सूक्ष्म है। उसे साधरणतः देखा नहीं जा सकता। उसके द्वारा प्रतिक्षण ही शरीरों की उत्पत्ति और नाश होते रहते हैं। सूक्ष्म होने के कारण ही प्रतिक्षण होने वाले जन्म-मरण नहीं दिख पड़ते। जैसे काल के प्रभाव से दिये की लौ, नदियों के प्रवाह अथवा वृक्ष के फलों की विशेष विशेष अवस्थाएँ बदलती रहती है, वैसे ही समस्त प्राणियों के शरीरों की आयु, अवस्था आदि भी बदलती रहती है। जैसे यह उन्हीं ज्योतियों का वही दीपक है, प्रवाह का यह वही जल है - ऐसा समझना और कहना मिथ्या है, वैसे ही विषय चिन्तन में व्यर्थ आयु बिताने वाले अविवेकी पुरुषों का ऐसा कहना और समझना कि वह वही पुरुष है, सर्वथा मिथ्या है। यद्यपि वह भ्रान्त पुरुष भी अपने कर्मों के बीज द्वारा न पैदा होता है और न मरता ही है, वह भी अजन्मा और अमर ही है, फिर भी वह भ्रान्ति से वह उत्पन्न होता है और मरता सा भी है, जैसे कि काष्ठ से युक्त अग्नि पैदा होता और नष्ट होता दिखाई देता है।

जब अविवेकी जीव अपने कर्मों के अनुसार जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकने लगता है, तब सात्विक कर्मों की आसक्ति से वह ऋषिलोक और देवलोक में, राजसिक कर्मों की आसक्ति से मनुष्य और असुर योनियों में तथा तामसी कर्मों की आसक्ति से भूत-प्रेत एवं पशु-पक्षी आदि योनियों में जाता है। जब मनुष्य किसी को नाचते गाते देखता है, तब वह स्वयं भी उसका अनुकरण करने - तान तोड़ने लगता है। वैसे ही जब जीव बुद्धि के गुणों को देखता है, तब स्वयं निष्क्रिय होने पर भी उसका अनुकरण करने के लिए बाध्य हो जाता है। जैसे नदी-तालाब आदि के जल के हिलने या चंचल होने पर उसमें प्रतिबिम्बित तट के वृक्ष भी उसके साथ हिलते-डोलते से जान पड़ते है, जैसे घुमाये जाने वाले नेत्रा के साथ साथ पृथ्वी भी घूमती हुई सी दिखायी देती है। भगवान श्रीकृष्ण भागवत के एकादश स्कंध में उद्धव जी से कहते हैं वैसे ही आत्मा का विषयानुभवरूप संसार भी सर्वथा असत्य है। आत्मा तो नित्य शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव ही है। विषयों के सत्य न होने पर भी जो जीव विषयों का ही चिन्तन करता रहता है, उसका यह जन्म मृत्युरूप संसार चक्र कभी निवृत्त नहीं होता, जैसे स्वप्न में प्राप्त अनर्थ परम्परा जागे बिना निवृत्त नहीं होती। इसलिए इन दुष्ट कभी तृप्त ना होने वाली इन्द्रियों (शरीर) से विषयों को मत भोगो। आत्म विषयक अज्ञान से प्रतीत होने वाला सांसारिक भेदभाव भ्रममूलक ही है, ऐसा समझो। वस्तुतः आत्मदृष्टि ही समस्त विपत्तियों से बचने का एकमात्र साधन है।

Tuesday, December 24, 2024

शरीर और मन को भी फिट रखती है गीता


प्रत्येक मनुष्य यही चाहता है कि उसका शरीर स्वस्थ रहे और मन शांत एवं प्रसन्नता का अनुभव करे। हमारा शरीर, मन आदि इन्द्रियाँ मूल प्रकृति से उत्पन्न पंच महाभूत आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से निर्मित हुआ है। प्रकृति परिवर्तनशील है, अतः हमारे शरीर में भी जन्म से ही परिवर्तन होता रहता है । बालकपन, जवानी, प्रोढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था में शरीर पूरी तरह से बदलता रहता है, और साथ-साथ हमारा मन, स्वभाव और व्यवहार आदि में भी परिपक्वता आती रहती है। लेकिन इन सभी अवस्थाओं का साक्षी जीव में परिवर्तन नहीं होता ।

शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिए भगवान श्रीकृष्ण गीता में पाँच सूत्र देते हुए कहते हैं कि जो हम खाते हैं वह आहार अर्थात् अन्न और चलना फिरना रूप जो पैरों की क्रिया है वह विहार यह दोनों जिसके नियमित परिमाण से होते हैं और कर्मों में जिसकी चेष्टा नियमित परिमाण में होती है, जिसका सोना और जागना नियत काल में यथायोग्य होता है, ऐसे योगी का दुखनाशक योग सिद्ध हो जाता है। श्रुति कहती है कि " जो अपनी शक्ति के अनुसार अन्न खाया जाता है, वह रक्षा करता है, वह कष्ट नहीं देता, जो उससे अधिक लेता है वह कष्ट देता है और जो प्रमाण से कम होता है वह रक्षा नहीं करता।" इसलिए मनुष्य को अपने लिए जितना उपयुक्त हो उससे कम या ज्यादा अन्न न खाने । पेट का आधा भाग भोजन से एवं तीसरा हिस्सा जल से पूर्ण करने के लिए तथा चौथा वायु के आने जाने के लिए खाली रखना चाहिए। इससे हमारे शरीर के अंदर जो तंत्र है वह सुचारू रूप से अपना कार्य करते हुए शरीर को स्वस्थ बनाये रखने में मदद करता है, उस पर बिना वजह बोझ नहीं पड़ता।

गीता में वर्णन आता है कि सात्विक या श्रेष्ठ पुरुष को आहार में ऐसे पदार्थ प्रिय होते हैं जिनके लेने से आयु, बुद्धि, बल, आरोग्यता, सुख-शांति और प्रसन्नता आदि बढ़ते हैं। अत: वह आहार लेने से पूर्व भोजन के पदार्थों पर विचार करता है। राजस या मध्यम पुरुष आहार लेने के पश्चात् विचार करते हैं कि जो पदार्थ भोजन में स्वाद या भोग बुद्धि के कारण ग्रहण किये हैं उनसे शरीर में दाह, रोग, दुख और चिन्ता आदि उत्पन्न हो रहे हैं । और कुछ मनुष्य न तो आहार से पूर्व या उसके बाद भी आहार में ग्रहण किये गये पदार्थों के विषय में विचार ही नहीं करते कि शरीर को अस्वस्थ करने में आहार का भी कोई योगदान है, उनकी दृष्टि तो केवल आहार पर ही केन्द्रित रहती है।

श्रुति में आता है कि खाया हुआ अन्न जठराग्नि द्वारा पचाये जाने पर तीन भागों में विभक्त हो जाता है। उसका जो अत्यन्त स्थूल भाग होता है वह मल हो जाता है, जो मध्यम भाग होता है वह रसादि क्रम से परिणत होकर माँस हो जाता है और जो अत्यन्त सूक्ष्म होता है वह मन हो जाता है। जैसे दूध से दही बनता है और मथे हुए दही का जो सूक्ष्म भाग होता है वह ऊपर इकट्ठा होकर मक्खन के रूप में आकर घृत होता है और नीचे छाछ रह जाती है।

इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद श्रुति के अनुसार पीया हुआ जल तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह मूत्र हो जाता है, जो मध्यम भाग होता है वह रक्त हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह प्राण हो जाता है । इसी तरह खाया हुआ तेज अर्थात् भक्षण किया हुआ तेल- धृत आदि तीन प्रकार का हो जाता है । उसका जो स्थूलतम अंश होता है वह हड्डी हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह मज्जा अर्थात् हड्डी के भीतर रहने वाला स्निग्ध पदार्थ हो जाता है और जो सूक्ष्मतम अंश है वह वाक (वाणी) हो जाता है। तेल- धृत आदि के भक्षण से ही वाणी विशद अर्थात् भाषण में समर्थ होती है। इसलिए मन अन्नमय है, प्राण जलमय है, और वाक तेजोमयी है। इस प्रकार हमें निस्वार्थ भाव, पूरी ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता और दूसरों का बिना अहित किये हुए शुद्ध धन अर्जित करके उसे अपने सात्विक भोजन के पदार्थों पर व्यय करना चाहिए।

इसलिए हमारा आहार सात्विक या शुद्ध होना चाहिए, क्योंकि आहार शुद्ध होने पर अन्त:करण अर्थात् मन और बुद्धि भी शुद्ध होते हैं। मन में निर्मलता आती है, राग-द्वेष आदि विकार दूर होने पर मन शांत और प्रसन्न रहता है। उसकी चंचलता कम होती है, अर्थात् मन एकाग्र होने पर बुद्धि निश्चयात्मक होती है उसमें उचित - अनुचित का ठीक-ठीक निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है, वह अपने लक्ष्य पर केन्द्रित रहती है । मन को एकाग्र और संतुलित बनाये रखने के लिए गीता में आत्मसंयम योग के अंतर्गत ध्यान की विधि का भी भगवान ने विस्तार से वर्णन किया है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने स्वरूप में स्थित रहता हुआ संसार में निर्लिप्त भाव से व्यवहार करता हुआ अपना जीवन यापन करता है । स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है और जो मनुष्य स्व अर्थात् अपने स्वरूप में स्थित है वही श्रुति के अनुसार स्वस्थ है।

बी. के. शर्मा