Thursday, October 8, 2026

माया, जीव और ईश्वर

‘रामायण’ का नाम तुलसीदास जी ने रामचरित मानस अर्थात् ‘राम के चरित्र’ मन से रचा है। परमात्मतत्व की जिज्ञासा रखने वाले जिज्ञासु जिस चिदानंदमय आत्मतत्व में नित्य रमण करते रहते हैं, वही राम शब्द से कहा जाता है और उसी को परब्रह्म कहते हैं। श्रीरघुनाथ जी की कथा को तुलसीदास जी ने अपने अंतःकरण के सुख के लिए अत्यन्त मनोहर भाषा रचना में रचना की है। अतः परमात्मा को प्राप्त करने के लिए बाहरी संसार समुद्र को पार करके अर्थात् बहिर्मुख से अंतर्मुखी होकर, अपने अंतःकरण अर्थात मानस में ही झांकना होगा। तुलसीदास जी ने मानस की दूसरी चौपाई में लिखा है कि श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्री पार्वती जी और श्री शंकर जी की मैं वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अंतःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते।

भगवान की मायाशक्ति के प्रभाव से हम बाहरी विषयों या दुनियादारी में ही आसक्त रहते हैं। कभी अंतःकरण में झांकने का समय ही नहीं मिलता। रामचरितमानस के उत्तरकांड में लक्ष्मण जी भगवान राम से कहते हैं कि ज्ञान, वैराग्य और माया का वर्णन कीजिए और उस भक्ति को कहिए जिसके कारण आप दया करते हैं तथा हे प्रभो, ईश्वर और जीव का भेद भी सब समझाकर कहिए, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम दूर हो जाये।

श्रीराम जी ने कहा, मैं थोड़े में ही सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि अर्थात् अंतःकरण को एकाग्र करके सुनो। ‘मैं और मेरा, तू और तेरा’ – यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है। **‘मैं अरु मोर तोर तैं माया, जिंहिं बस कीन्हे जीव निकाया’।** इन्द्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई, उस सबको माया जानना। इसके भी दो भेद हैं एक विद्या और दूसरी अविद्या।

एक अविद्या माया दुष्ट दोष युक्त है और अत्यन्त दुखद है जिसके वश होकर जीव संसार रूपी कुएँ में पड़ा हुआ है और एक विद्या जिसके वश में गुण हैं और जो जगत की रचना करती है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसका अपना बल कुछ भी नहीं है।

लक्ष्मण द्वारा पूछे गए 6 प्रश्नों में, पहला प्रश्न ज्ञान के विषय में, फिर वैराग्य, माया, भक्ति, ईश्वर और जीव के विषय में थे, लेकिन भगवान ने पहले माया के विषय में बतलाया, क्योंकि माया के वशीभूत होकर ही हम अपना पूरा जीवन व्यतीत करके, इस मनुष्य शरीर को छोड़ देते हैं। बाकी ज्ञान, वैराग्य, भक्ति आदि विषयों पर तो हम विचार ही नहीं कर पाते।

ज्ञान के विषय में प्रभु कहते हैं कि जहाँ मान अर्थात अपने में श्रेष्ठता का भाव न होना, दिखावटीपन का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, स्थिरता, मन का वश में होना, इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य का होना, अहंकार का भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियों में दुखरूप दोषों को बार-बार देखना, आसक्ति-रहित होना, पुत्र-स्त्री, घर आदि में घनिष्ठ सम्बन्ध न होना और अनुकूलता-प्रतिकूलता की प्राप्ति में चित्त का नित्य सम रहना, ईश्वर में अनन्य योग के द्वारा भक्ति का होना, एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव होना और जनसमुदाय में प्रीति का न होना, अध्यात्मज्ञान में नित्य निरन्तर रहना, तत्वज्ञान के अर्थ को परमात्मा को सब जगह देखना तथा जो सबमें समानरूप से ब्रह्म को देखता है, ऐसे सब ज्ञान के साधन कहलाते हैं, जिनके विषय में भगवान ने गीता के अध्याय 13 के श्लोक 7 से 11 तक कहा है।

जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों (सतगुण, रजोगुण, तमोगुण) को तिनके के समान त्याज्य समझता है उसी को परम वैराग्यवान कहना चाहिए। अर्थात जिसका आत्मा से अन्य जितने अनात्म पदार्थ, विषय आदि हैं उनमें राग या आसक्ति का न होना, सबसे अलग हो जाना ही वैराग्य कहलाता है। साधन चतुष्टय में विवेक के बाद वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षा आते हैं अतः साधक में विवेक से युक्त वैराग्य का होना अत्यन्त आवश्यक है। जीव और ईश्वर के प्रश्न के उत्तर में भगवान राम कहते हैं कि जो माया को, ईश्वर को और अपने स्वरूप को नहीं जानता, उसे जीव कहते हैं। जो कर्मानुसार बंधन और मोक्ष देने वाला, सबसे परे और माया का प्रेरक है वह ईश्वर है।

**माया ईस न आपुहुँ जान कहिअ सो जीव। बंध मोच्छ प्रद सर्वपर माया प्रेरक सीव।।**

**धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।। जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।।**

धर्म के आचरण से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है, तथा ज्ञान मोक्ष को देने वाला है, ऐसे वेदों में वर्णन किया है। और हे भाई जिसमें मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देने वाली है। यह भक्ति स्वतंत्र है, उसको ज्ञान-विज्ञान आदि किसी दूसरे साधन का सहारा नहीं है। सब ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात भक्ति अनुपम एवं सुख का मूल है और वह तभी मिलती है जब संत पुरुष अनुकूल होते हैं। जिनका कर्म, वचन और मन से मेरी ही गति है और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय कमल में मैं सदा विश्राम किया करता हूँ।

इसी तरह पक्षीराज गरुड़ जी ने रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में कागभुशुण्डी जी से सात प्रश्न पूछे:- सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है इसके उत्तर में कागभुशुण्डी जी कहते हैं कि मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। यह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है। ऐसे मनुष्य शरीर को प्राप्त करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं।

गरुड़ जी ने पूछा कि सबसे बड़ा दुख कौनसा है और सबसे बड़ा सुख कौन है? जिसके विषय में कागभुशुण्डी जी कहते हैं कि जगत में दरिद्रता के समान दुख नहीं है तथा संतों के मिलन के समान जगत में सुख नहीं है। फिर गरुड़ जी ने पूछा कि संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए। जिसके विषय में कहते हैं कि मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है। संत दूसरों की भलाई के लिए दुख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुख पहुँचाने के लिए। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं, किन्तु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और उन्हें बाँधने के लिए अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं। वे परायी सम्पत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्ट का अभ्युदय प्रसिद्ध अधम ग्रह (केतु) के उदय की भाँति जगत के दुख के लिए ही होता है। संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्य का उदय विश्वभर के लिए सुखदायक है।

आगे गरुड़ जी पूछते हैं कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान पुण्य कौन सा है और सबसे महान भयंकर पाप कौन है। उत्तर में आता है कि वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है। शंकर जी और गुरु की निन्दा करने वाला अगले जन्म में मेढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निन्दा करने वाला बहुत से नरक भोगकर, फिर कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है। जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निन्दा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निन्दा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया रहता है। जो पुरुष मनुष्य सबकी निन्दा करते हैं वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं।

गरुड़ जी अन्तिम सातवें प्रश्न में मानस रोगों के विषय में पूछते हैं जिसके उत्तर में काकभुशुण्डि जी कहते हैं—

**मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला। काम वात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।**

सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ बढ़ा हुआ कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है। यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें तो दुखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से पूर्ण होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं वे ही सब कष्टदायक रोग हैं, वे अपार हैं। ममता दाद है, ईर्ष्या खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है। पराये सुख को देखकर जो जलन होती है वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है। अहंकार अत्यन्त दुख देने वाला गाँठ का रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नसों का रोग है। तृष्णा बड़ा भारी जलोदर रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी अर्थात मलेरिया, बुखार की तरह हैं। मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। ये रोग निरन्तर जीव को कष्ट देते रहते हैं। ऐसी दशा में वह समाधि (शान्ति) को कैसे प्राप्त करे। मन को निरोग हुआ तब जानना चाहिए, जब हृदय में वैराग्य का बल बढ़ जाये। उत्तम बुद्धि रूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयों की आशारूपी दुर्बलता मिट जाये। इस प्रकार सब रोगों से छूटकर जब मनुष्य निर्मल ज्ञानरूपी जल में स्नान कर लेता है, तब उसके हृदय में रामभक्ति छा जाती है। श्री रघुनाथ जी की भक्ति के बिना सुख नहीं है।

**डॉ. बाल कृष्ण शर्मा**

Website: Peacefulmindandlife.com

Tuesday, May 12, 2026

क्रोध पर नियंत्रण करके हम अपना एवं समाज दोनों का भला कर सकते हैं।



आजकल हम देखते है कि प्रत्येक मनुष्य को छोटी-मोटी अनावश्यक बातों पर बहुत जल्दी क्रोध आ जाता है, और उससे समाज में हिंसा, झगड़ा और कभी-कभी एक दूसरे की मृत्यु तक पहुँचकर शांत होता है। उसके बाद केवल पश्चाताप रह जाता है, लेकिन क्रोध के द्वारा जो हमारा और दूसरों का अहित हो सकता था वह तो हो चुका होता है। क्रोध के आने पर हमारी बुद्धि और विवेक ढक जाते है और दूसरों का अनिष्ट करने की वृति हमारे अंदर उत्पन्न हो जाती है। यदि क्रोध के मूल पर विचार करें तब हमारे मन के अंदर जो छिपी हुई इच्छाएं, कामनाएं या स्वार्थ रहता है, उसमें विघ्न आने पर यदि सामने वाला व्यक्ति हमसे कमजोर है तब वह क्रोध के रूप में व्यक्त होता है और यदि वह हमसे बलवान है तब भय के कारण हमारे अंदर दब जाता है और उचित समय आने पर किसी अन्य परिस्थिति जो हमारे मन के अनुकूल नहीं होती तब वह छिपा हुआ भय ही क्रोध के रूप में सामने आ जाता है।

हमारे अंदर रहने वाला क्रोध एक प्रज्वलित अग्नि के समान हमे अशांत बनाये रखता है, और यह हमारे स्वभाव का एक हिस्सा बन जाता है। क्रोध के सूक्ष्म रूप को द्वेष कहते है और यह हमारे अंदर धीमी अग्नि के समान सुलगता रहता है। अतः दूसरों के प्रति क्रोध और द्वेष भाव हमारे सबसे बढ़े शत्रु है। शास्त्र में आता है कि जो मनुष्य काम-क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन कर सकता है अर्थात उसके अनुसार प्रतिक्रिया नहीं करता, वही सुखी है और योगी है। द्वेष हमारे संस्कार में रहता है, क्रोध हमारे मन के अंदर रहता है और उसके कारण हिंसा की क्रिया बाहर समाज में देखी जाती है।

हमारे शरीर में स्थित मन हमारी इन्द्रियों और बुद्धि के बीच में स्थित रहता है। अतः यह इन्द्रियों से प्राप्त बाहरी विषयों का ज्ञान और बुद्धि से प्राप्त ज्ञान और उसका परिणाम दोनों से प्रभावित होता रहता है। इसलिए मन में सदा द्वन्द बना रहने के कारण यह अधिकांशत: अशांत रहता है और ध्यान आदि आंतरिक क्रिया या संसार के बाहरी विषयों में शांति की तलाश करता रहता है। जब हमारा मन, विवेकयुक्त बुद्धि के अनुसार कार्य करता है और काम-क्रोध आदि पर अपना नियंत्रण रखता है तब हम एक शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। और यदि विवेक के स्थान पर हमारी बुद्धि के अंदर कामनाएं प्रवेश कर जाती है तब हमारा मन इच्छाओं के अनुसार कार्य करता है चाहे वह उचित हो या अनुचित। और इच्छा के विपरीत स्थिति आने पर उसके अंदर क्रोध उत्पन्न होता है। ऐसी परिस्थिति में उसे धर्म-अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं रहता, बस वह केवल अपनी इच्छा की पूर्ति करना चाहता है। मनुस्मृति में आता है कि अधर्मी पहले अधर्म से बढ़ता है, फिर उससे अपना भला देखता है, फिर शत्रुओं को जीतता है और फिर जड़ सहित नष्ट हो जाता है।

अत: समाज में हिंसा को कम करने के लिए हमें अपने क्रोधित स्वभाव पर नियंत्रण रखना होगा। क्रोध हमें अंदर से मानसिक तनाव, अनिद्रा की स्थिति के द्वारा नुकसान पहुंचाता है और उसके परिणामस्वरूप हिंसा की क्रिया दूसरों को नुकसान पहुंचाती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सबसे कहते है कि जो मनुष्य इच्छा, भय और क्रोध से सर्वथा रहित है वह सदा मुक्त ही है। कभी-कभी हमारा स्वभाव बन जाता है कि दूसरे मनुष्य हमारी इच्छा के अनुसार चलें या कार्य करें, यदि ऐसा नहीं होता तब हमें क्रोध आता है और हिंसात्मक क्रिया बाहर होती है। अत: अपनी इच्छा पूर्ति के लिए कर्म करने से पूर्व हमें भली भांति अपनी सामर्थ्य, परिणाम, दूसरों का हित-अहित आदि संबंधित विषयों पर भलीभाँति विचार कर लेना चाहिए और उनमें कोई विघ्न आने पर दूसरों पर क्रोध न करते हुए उस विपरीत परिस्थिति पर शांतिपूर्वक विचार करना चाहिए। क्रोध से किसी भी समस्या का हल नहीं निकलता और वह और अधिक जटिल हो जाती है, जिससे हमारा स्वयं का और समाज का अहित ही होता है।

डॉ. बी.के शर्मा

Sunday, June 1, 2025

स्वर्ग और नरक की प्राप्ति कराने वाले कर्मों का वर्णन



महाभारत के अनुशासन पर्व में माता पार्वती भगवान महेश्वर से पूछती है कि किस प्रकार के शील, आचरण, कर्म और दान के द्वारा मनुष्य स्वर्ग में जाता है।

भगवान महेश्वर ने कहा-देवी, जो मनुष्य ब्राह्मणों का सम्मान और दान करता है, दीन दुखी और दरिद्र मनुष्यों को भक्ष्य-भोज्य, अन्न दान और वस्त्र प्रदान करता है, ठहरने के स्थान, धर्मशाला, कुँआ, प्याऊ और बावड़ी आदि बनवाता है, लेने वाले लोगों की इच्छा पूछ पूछकर नित्य देने योग्य वस्तुएं दान करता है, आसन, शय्या, सवारी, गृह, रत्न, धन-धान्य, गौ, खेत और कन्याओं का प्रसन्नतापूर्वक दान करता है, वह देवलोक में निवास करता है। और पुण्यकर्मों का भोग समाप्त होने पर वहां से मनुष्यलोक में आकर सुख-सामग्रियों से संपन्न उत्तम कुल में जन्म लेता है। उसके पास धन-धान्य की कमी नहीं रहती। दान देने वाले प्राणी ही ऐसे महान सौभाग्य से युक्त होते हैं-यह बात ब्रह्मा जी ने बहुत पहले से ही बता रखी है। दाता पुरुष सबके प्रिय होते हैं।

इनके सिवा बहुत से मनुष्य ऐसे होते हैं जो किसी को कुछ देने में कंजूसी करते हैं। वे मन्दबुद्धि पुरुष ब्राह्मणों के मांगने पर अपने पास धन होते हुए भी कुछ नहीं देते। दीनों, अंधें, दरिद्रों, भिखमंगों और अतिथियों को देखते ही हट जाते हैं। उनके याचना करने पर भी जिह्वा की लोलुपता के कारण अन्न नहीं देते। कभी भी धन, वस्त्र, सुवर्ण, गौ और अन्न की बनी हुई नाना प्रकार की खाद्य वस्तुओं का दान नहीं करते। इस प्रकार के अधर्मी, लोभी, नास्तिक एवं दान से जी चुराने वाले मुर्ख लोग नरक में पड़ते हैं। यदि कालचक्र के फेर से पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेते हैं तो निर्धन कुल में ही जन्म लेते हैं। वे हमेशा भूख प्यास का कष्ट सहते हैं, सब लोग उन्हें अपने समाज से बाहर कर देते हैं तथा वे सब प्रकार के भोगों से निराश होकर पापाचार से जीविका चलाते हैं अथवा वे थोड़े से वैभव वाले कुल में उत्पन्न होते और थोड़े से ही भोग भोगते हैं।

इनके सिवा, दूसरे भी ऐसे मनुष्य हैं जो सदा गर्व और अभिमान में फूले और पाप में परायण रहते हैं। जो मूर्ख मार्ग देने योग्य पुरुषों को जाने के लिए मार्ग नहीं देते, गुरु के आने पर प्रेमपूर्वक उनकी पूजा नहीं करते तथा अभिमान और लोभ के वशीभूत होकर सम्माननीय पुरुषों का अपमान एवं वृद्धजनों का तिरस्कार करते हैं, इस प्रकार के आचरण करने वाले सभी लोग नरकगामी होते हैं और जब वे नरक से छुटकारा पाते हैं तो बहुत वर्षों के बाद अत्यन्त निन्दित कुल में जन्म लेते हैं। गुरु और बड़े बूढ़ों का अपमान करने वाले मनुष्यों का मूर्ख और घृणित चाण्डालों के कुल में जन्म होता है।

जिनमें गर्व और अभिमान का नाम नहीं होता, जो देवता और ब्राह्मणों की पूजा करता है, संसार के लोग जिसे पूज्य मानते हैं, जो बड़ो को प्रणाम करने वाला, विनयी, मीठे वचन बोलने वाला, सब वर्णों का प्रिय, और सम्पूर्ण प्राणियों का हित करने वाला है, जिसका किसी के साथ द्वेष नहीं है, जिसका मुख प्रसन्न और स्वभाव कोमल है जो स्वागतपूर्वक स्नेहभरी वाणी बोलता है, किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करता तथा सबका सत्कार और पूजन करता है, जो मार्ग देने योग्य पुरुष को मार्ग देता है, गुरु का यथोचित सत्कार करता और अतिथियों को आमन्त्रित करके उनकी पूजा करता है- ऐसा मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त करता है। फिर वहां का भोग समाप्त होने पर मनुष्य योनि में आकर वह उत्तम कुल में उत्पन्न होता है। वहां सब प्राणी उसका आदर करते हैं और सब लोग उसके सामने मस्तक झुकाते हैं।

इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मों का फल सदा स्वयं ही भोगता है। धर्मात्मा मनुष्य सर्वदा उत्तम कुल, उत्तम जाति और उत्तम स्थान में जन्म लेता है। यह साक्षात ब्रह्मा जी के बताये हुए धर्म का वर्णन किया है। जिस मनुष्य का आचरण क्रूरता से भरा हुआ है, जो समस्त जीवों के लिए भयंकर है, जो हाथ, पैर, रस्सी, डंडे और ढेले से मारकर, खंभे में बांधकर तथा घातक शस्त्रों का प्रहार करके जीव जन्तुओं को सताता और भयावह रूप धरण करके उन पर आक्रमण करता है, ऐसे स्वभाव वाले मनुष्य को नरक में गिरना पड़ता है। और कालचक्र में पड़कर यदि वो मनुष्य योनि में आता है तो अनेकों प्रकार की विघ्न बाधाओं से कष्ट उठाने वाले अधम कुल में उत्पन्न होता है। ऐसा मनुष्य अपने किये हुए कर्मों के अनुसार जगत में नीच समझा जाता है और सब लोग उससे द्वेष रखते हैं।

इसके विपरीत जो मनुष्य सब प्राणियों के प्रति दयादृष्टि रखता है, सबको मित्र समझता है, सबके ऊपर पिता के समान स्नेह रखता है, किसी के साथ वैर नहीं करता और इन्द्रियों को वश में किये रहता है, जो हाथ पैर आदि को अपने अधीन रखकर किसी भी जीव को ना उद्वेग में डालता और ना मारता ही है, सब प्राणी जिस पर विश्वास करते हैं, जिसका कर्म मृदु होता है तथा जो सदा ही दयाभाव से युक्त रहता है, ऐसे स्वभाव और आचरण वाला पुरुष स्वर्गलोक के दिव्य भवन में देवताओं की भाँति आनन्दपूर्वक निवास करता है। फिर पुण्यकर्मों के क्षीण होने पर यदि वह मृत्युलोक में जन्म लेता है तो उसके ऊपर बाधाओें का आक्रमण कम होता है। वह निर्भय, सुखी और उद्वेग से रहित जीवन व्यतीत करता है। देवि, यह सज्जन पुरुष का मार्ग है, जहां किसी प्रकार की विघ्न बाधा नहीं आने पाती।

जो मनुष्य धर्म से उपार्जित किये हुए धन को भोगते और सत्यधर्म में परायण रहते हैं, वे स्वर्ग में जाते हैं। जिनके सब प्रकार के संदेह दूर हो गये हैं, जो प्रलय और उत्पत्ति के तत्व को जानने वाले सर्वज्ञ और सर्वदृष्टा है, जिनकी आसक्ति दूर हो गयी है तथा जो मन, वाणी और कर्म से किसी जीव की हिंसा नहीं करते, वे ही पुरुष कर्म-बंधनों से मुक्त होते हैं। उन्हें न धर्म बांधता है न अधर्म। जो कहीं आसक्त नहीं होते, किसी के प्राणों की हत्या से दूर रहते हैं तथा जो सुशील और दयालु हैं, वे भी कर्मों के बन्धन में नहीं पड़ते। जो शत्रु और मित्र को समान समझने वाले हैं, वे जितेन्द्रिय पुरुष कर्मबन्धन से मुक्त हो जाते हैं। जो सब प्राणियों पर दया करने वाले, सबके विश्वासपात्र तथा हिंसामय आचरणों को त्याग देने वाले हैं वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं। जो दूसरों के धन पर ममता नहीं रखते, परायी स्त्री से सदा दूर रहते और धर्म के द्वारा प्राप्त किये हुये अन्न का ही भोजन करते हैं, जिनका दूसरों की स्त्रियों के प्रति माता, बहन और बेटी के समान भाव रहता है, जो सदा अपने ही धन से संतुष्ट रहकर चोरी आदि से दूर रहते हैं, जिन्हें सदा अपने भाग्य का ही भरोसा रहता है, जिनकी इन्द्रियाँ काबू में रहती है तथा जो शील को ही श्रेष्ठ समझकर उसमें स्थित रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्ग में जाते हैं। यह देवताओं का बनाया हुआ मार्ग है। विद्वान पुरुष को सदा ही इसका सेवन करना चाहिए।

जो मनुष्य अपने या दूसरे के लिए हँसी-परिहास में भी झूठ नहीं बोलते, आजीविका, धर्म अथवा किसी कामना के लिए असत्य भाषण नहीं करते, जिनकी वाणी मन को प्रिय लगने वाली, किसी को दुख न पहुँचाने वाली, पापपूर्ण विचारों से रहित तथा स्वागत-सत्कार के भाव से युक्त रहती है तथा जो कभी रुखी, कड़वी और निष्ठुरतापूर्ण बात मुँह से नहीं निकालते, वे सज्जन पुरुष स्वर्ग में जाते हैं। मनुष्यों को इस वाणी के धर्म का सदा सेवन करना चाहिए। विद्वानों को सर्वदा शुभ और सत्य वचन बोलना तथा मिथ्या का त्याग करना उचित है। उपुर्यक्त कर्मों का निष्काम भाव से आचरण करने वाले पुरुष को परमात्मपद की प्राप्ति हो जाती है।

शरीर और आत्मा



शरीर और आत्मा इन दोनों में अत्यन्त भेद है। शरीर की नौ अवस्थाएं गर्भाधन, गर्भवृद्धी, जन्म, बाल्यावस्था, कुमारावस्था, जवानी, अधेड़ अवस्था, बुढ़ापा और मृत्यु है। यह शरीर जीव से भिन्न है। देह, इन्द्रिय, प्राण और मन में स्थित आत्मा ही जब उनका अभिमान कर बैठता है - उन्हें अपना स्वरूप मान लेता है - तब उसका नाम जीव हो जाता है। उस सूक्ष्मातिसूक्ष्म आत्मा की मूर्ति है - गुण और कर्मों का बना हुआ सूक्ष्म शरीर। उसे ही कहीं सूत्रात्मा कहा जाता है और कहीं महतत्त्व। वही कालरूप परमेश्वर के अधीन होकर जन्म-मृत्यु रूप संसार में इधर-उधर भटकता रहता है।

श्रीमद्भागवत पुराण में उद्धव जी भगवान से पूछते हैं कि आत्मा है दृष्टा और शरीर है दृश्य। आत्मा स्वयं प्रकाश है और शरीर है जड़। ऐसी स्थिति में जन्म मृत्यु रूप संसार न शरीर को हो सकता है और न आत्मा को। परन्तु इसका होना भी उपलब्ध होता है, तब यह होता किसको है? आत्मा तो अविनाशी, प्राकृत-अप्राकृत गुणों से रहित, शुद्ध, स्वयंप्रकाश और सभी प्रकार के आवरणों से रहित है तथा शरीर विनाशी, सगुण, अशुद्ध, प्रकाश्य और आवृत्त है। आत्मा अग्नि के समान प्रकाशमान है, तो शरीर काठ की तरह अचेतन। फिर यह जन्म मृत्युरूप संसार है किसे?

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, वस्तुतः संसार का अस्तित्व नहीं है तथापि जब तक देह, इन्द्रिय और प्राणों के साथ आत्मा की संबंध भ्रांति है, तब तक अविवेकी पुरुष को वह सत्य सा स्फुरित है। जैसे स्वप्न में अनेकों विपत्तियाँ आती है पर वास्तव में वे हैं नहीं, फिर भी स्वप्न टूटने तक उनका अस्तित्व नहीं मिटता, वैसे ही संसार के न होने पर भी जो उसमें प्रतीत होने वाले विषयों का चिन्तन करते रहते हैं, उनके जन्म मृत्यु रूप संसार की निवृत्ति नहीं होती। अहंकार ही शोक, हर्ष, भय, क्रोध, लोभ, मोह, स्पृहा और जन्म-मृत्यु का शिकार बनता है। आत्मा से तो इनका कोई संबंध ही नहीं है। वास्तव में मन, वाणी, प्राण और शरीर अहंकार के ही कार्य हैं। यह है तो निर्मूल, परन्तु देवता, मनुष्य आदि अनेक रूपों में इसी की प्रतीति होती है।

आत्मा और अनात्मा (शरीर आदि) के स्वरूप को पृथक पृथक भलीभाँति समझना ही ज्ञान है, क्योंकि विवेक होते ही द्वैत का अस्तित्व मिट जाता है। उसका साधन है तपस्या के द्वारा हृदय को शुद्ध करके वेदादि शास्त्रों का श्रवण करना। अनेकों प्रकार के गुण और कर्मों से युक्त देह, इन्द्रिय आदि पदार्थ पहले अज्ञान के कारण आत्मा से अभिन्न मान लिए गये थे, उनका विवेक नहीं था। अब आत्मदृष्टि होने पर अज्ञान और उसके कार्यों की निवृत्ति हो जाती है। इसलिए अज्ञान की निवृत्ति ही अभिष्ट है। वृत्तियों के द्वारा न तो आत्मा का ग्रहण हो सकता है और न त्याग। जैसे सूर्य उदय होने पर मनुष्य के नेत्रों के सामने से अन्धकार का पर्दा हटा देते हैं, किसी नयी वस्तु का निर्माण नहीं करते, वैसे ही अपने स्वरूप का दृढ़ अपरोक्षज्ञान पुरुष के बुद्धिगत अज्ञान का आवरण नष्ट कर देता है। आत्मा नित्य अपरोक्ष है, उसकी प्राप्ति नहीं करनी पड़ती। वह स्वयंप्रकाश है। उसमें अज्ञान आदि किसी प्रकार के विकार नहीं है। वह जन्मरहित है अर्थात् कभी किसी प्रकार भी वृत्ति में आरूढ़ नहीं होता। इसलिए अप्रमेय है। ज्ञान आदि के द्वारा उसका संस्कार भी नहीं किया जा सकता।

मनुष्यों का मन कर्म संस्कारों का पुँज है। उन संस्कारों के अनुसार भोग प्राप्त करने के लिए उसके साथ पाँच इन्द्रियाँ भी लगी हुई है। इसी का नाम है सूक्ष्म या लिंग शरीर। वही कर्मों के अनुसार एक शरीर से दूसरे शरीर में, एक लोक से दूसरे लोक में आता जाता रहता है। आत्मा इस लिंग शरीर से सर्वथा पृथक है। उसका आना जाना नहीं होता, परन्तु जब वह अपने को लिंग शरीर ही समझ बैठता है, उसी में अहंकार कर लेता है, तब उसे भी अपना आना जाना प्रतीत होने लगता है।

मन कर्मों के अधीन है, वह देखे हुए या सुने हुए विषयों का चिन्तन करने लगता है और क्षण भर में ही उनमें तदाकार हो जाता है तथा उन्हीं पूर्व चिन्तित विषयों में लीन हो जाता है। जब यह जीव किसी भी शरीर को अभेद भाव से मैं के रूप में स्वीकार कर लेता है, तब उसे ही जन्म कहते हैं, वैसे ही जैसे स्वप्नकालीन और मनोरथ कालीन शरीर में अभिमान करना ही स्वप्न और मनोरथ कहा जाता है। यह वर्तमान देह में स्थित जीव जैसे पूर्व देह का स्मरण नहीं करता, वैसे ही स्वप्न या मनोरथ में स्थित जीव भी पहले के स्वप्न और मनोरथ को स्मरण नहीं करता, प्रत्युत उस वर्तमान स्वप्न और मनोरथ में पूर्व सिद्ध होने पर भी अपने को नवीन सा ही समझता है।

काल की गति सूक्ष्म है। उसे साधरणतः देखा नहीं जा सकता। उसके द्वारा प्रतिक्षण ही शरीरों की उत्पत्ति और नाश होते रहते हैं। सूक्ष्म होने के कारण ही प्रतिक्षण होने वाले जन्म-मरण नहीं दिख पड़ते। जैसे काल के प्रभाव से दिये की लौ, नदियों के प्रवाह अथवा वृक्ष के फलों की विशेष विशेष अवस्थाएँ बदलती रहती है, वैसे ही समस्त प्राणियों के शरीरों की आयु, अवस्था आदि भी बदलती रहती है। जैसे यह उन्हीं ज्योतियों का वही दीपक है, प्रवाह का यह वही जल है - ऐसा समझना और कहना मिथ्या है, वैसे ही विषय चिन्तन में व्यर्थ आयु बिताने वाले अविवेकी पुरुषों का ऐसा कहना और समझना कि वह वही पुरुष है, सर्वथा मिथ्या है। यद्यपि वह भ्रान्त पुरुष भी अपने कर्मों के बीज द्वारा न पैदा होता है और न मरता ही है, वह भी अजन्मा और अमर ही है, फिर भी वह भ्रान्ति से वह उत्पन्न होता है और मरता सा भी है, जैसे कि काष्ठ से युक्त अग्नि पैदा होता और नष्ट होता दिखाई देता है।

जब अविवेकी जीव अपने कर्मों के अनुसार जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकने लगता है, तब सात्विक कर्मों की आसक्ति से वह ऋषिलोक और देवलोक में, राजसिक कर्मों की आसक्ति से मनुष्य और असुर योनियों में तथा तामसी कर्मों की आसक्ति से भूत-प्रेत एवं पशु-पक्षी आदि योनियों में जाता है। जब मनुष्य किसी को नाचते गाते देखता है, तब वह स्वयं भी उसका अनुकरण करने - तान तोड़ने लगता है। वैसे ही जब जीव बुद्धि के गुणों को देखता है, तब स्वयं निष्क्रिय होने पर भी उसका अनुकरण करने के लिए बाध्य हो जाता है। जैसे नदी-तालाब आदि के जल के हिलने या चंचल होने पर उसमें प्रतिबिम्बित तट के वृक्ष भी उसके साथ हिलते-डोलते से जान पड़ते है, जैसे घुमाये जाने वाले नेत्रा के साथ साथ पृथ्वी भी घूमती हुई सी दिखायी देती है। भगवान श्रीकृष्ण भागवत के एकादश स्कंध में उद्धव जी से कहते हैं वैसे ही आत्मा का विषयानुभवरूप संसार भी सर्वथा असत्य है। आत्मा तो नित्य शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव ही है। विषयों के सत्य न होने पर भी जो जीव विषयों का ही चिन्तन करता रहता है, उसका यह जन्म मृत्युरूप संसार चक्र कभी निवृत्त नहीं होता, जैसे स्वप्न में प्राप्त अनर्थ परम्परा जागे बिना निवृत्त नहीं होती। इसलिए इन दुष्ट कभी तृप्त ना होने वाली इन्द्रियों (शरीर) से विषयों को मत भोगो। आत्म विषयक अज्ञान से प्रतीत होने वाला सांसारिक भेदभाव भ्रममूलक ही है, ऐसा समझो। वस्तुतः आत्मदृष्टि ही समस्त विपत्तियों से बचने का एकमात्र साधन है।