Saturday, January 9, 2021

गीता ज्ञान का सागर है, हमें कर्म की राह पर ले जाती है - 09.01.2021

 

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष मोक्षदा एकादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश युद्ध भूमि में दिया था। महाभारत के युद्ध का शंखनाद हो चुका था लेकिन विपक्ष में अपने संबंधियों को देखकर अर्जुन को मोह उत्पन्न हो गया और वह भगवान से कहने लगा, ‘क्या उचित है, युद्ध करना या ना करना? मुझे शिक्षा दीजिए, मैं आपकी शरण में हूँ। मैं युद्ध नहीं करूंगा। अर्थात उस समय जो अर्जुन का कर्तव्यकर्म था उससे पीछे हटने लगा। ऐसी ही स्थिति कभी-कभी हमारी भी हो जाती है जब हम किसी कार्य को करने की काफी समय तक तैयारी करते हैं लेकिन कार्य के शुरू करने के ठीक पहले भावनाओं में बहकर या किन्हीं अन्य कारणों से हम अपने कर्तव्यकर्म के विषय में उचित निर्णय नहीं ले पाते। यानी कर्तव्य-अकर्तव्य के असमंजस में फंस जाते हैं और अपने नियत कर्तव्यकर्म का त्याग भी कर बैठते हैं। ऐसी स्थिति में अर्जुन की ही तरह गीता में भगवान द्वारा दिए गए उपदेश हमारा आज भी उचित मार्गदर्शन करते हैं। और निस्वार्थ भाव से हमें अपने कर्तव्यकर्म करने की प्रेरणा देते हैं।

महात्मा गांधी जी के अनुसार मानव जीवन ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय है और गीता इन से संबंधित सभी समस्याओं का समाधान है। स्वाध्याय पूर्वक गीता का किया गया अध्ययन जीवन के गूढ़ रहस्य को उजागर करता है।

भगवद गीता एक उत्तम, प्रत्यक्ष फल देने वाला, अति पवित्र और साधन करने में बड़ा सुगम अलौकिक ग्रंथ है। अनेक शास्त्रों में मनुष्यों के लिए जितने भी कल्याण कारक साधन बतलाए गए हैं। उन सभी को गीता में बतलाया गया है। अर्जुन युद्ध रूपी अपना कर्तव्यकर्म करते हुए अपने कल्याण की भी इच्छा रखते थे। इसलिए गीता में उनके सभी प्रश्न कल्याण के ही विषय में पूछे गए। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने सब जीवों के कल्याणार्थ अर्जुन के बहाने इस तात्विक ग्रंथ रत्न को संसार में प्रकट किया है। वाराह पुराण में भगवान स्वयं कहते हैं कि मैं गीता के आश्रय में रहता हूँ, गीता मेरा श्रेष्ठ घर है। गीता के ज्ञान का सहारा लेकर ही मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ।

गीता, ज्ञान का अथाह समुद्र है। कोई भी कर्तव्यनिष्ठ मनुष्य यदि व्यक्तिगत, पारिवारिक, व्यापारिक या सामाजिक समस्या का सामना करता हो तो उसे गीता में भगवान के कहे गए किसी न किसी श्लोक में उचित मार्ग अवश्य ही मिल जाएगा। गांधी जी का कहना था कि जब कभी संदेह मुझे घेरते हैं और मेरे चेहरे पर निराशा छाने लगती है तब मैं क्षितिज पर गीता रूपी एक ही उम्मीद की किरण देखता हूँ। इसमें मुझे अवश्य ही एक छंद मिल जाता है जो मुझे सांत्वना देता है तब मैं कष्टों के बीच मुस्कुराने लगता हूँ। जिस मोह के  कारण अर्जुन ने शुरू में ही कह दिया था कि मैं युद्ध नहीं करूंगा, गीता का पूरा उपदेश सुनने के बाद अर्जुन ने अपने अंतिम श्लोक में कहा है कि हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है अब मैं संशय रहित हो गया हूँ। आपकी आज्ञा का पालन करूंगा। हमें भी नित्य प्रति गीता के कुछ श्लोकों का अध्यनन एवं चिंतन करते रहना चाहिए ताकि हम भी भगवान की आज्ञानुसार अपना कर्तव्य कर्म निःस्वार्थ भाव से करते हुए तनाव रहित जीवन का आन्नद लेने के साथ-साथ कर्म बन्धन से भी मुक्त रह सकें।

                                         धन्यवाद                                              डॉ बी. के. शर्मा


(मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स में स्पीकिंग ट्री के अंतर्गत 25 दिसम्बर, 2020, गीता जयंती के दिन प्रकाशित हुआ है।)

No comments:

Post a Comment