Tuesday, May 12, 2026

क्रोध पर नियंत्रण करके हम अपना एवं समाज दोनों का भला कर सकते हैं।



आजकल हम देखते है कि प्रत्येक मनुष्य को छोटी-मोटी अनावश्यक बातों पर बहुत जल्दी क्रोध आ जाता है, और उससे समाज में हिंसा, झगड़ा और कभी-कभी एक दूसरे की मृत्यु तक पहुँचकर शांत होता है। उसके बाद केवल पश्चाताप रह जाता है, लेकिन क्रोध के द्वारा जो हमारा और दूसरों का अहित हो सकता था वह तो हो चुका होता है। क्रोध के आने पर हमारी बुद्धि और विवेक ढक जाते है और दूसरों का अनिष्ट करने की वृति हमारे अंदर उत्पन्न हो जाती है। यदि क्रोध के मूल पर विचार करें तब हमारे मन के अंदर जो छिपी हुई इच्छाएं, कामनाएं या स्वार्थ रहता है, उसमें विघ्न आने पर यदि सामने वाला व्यक्ति हमसे कमजोर है तब वह क्रोध के रूप में व्यक्त होता है और यदि वह हमसे बलवान है तब भय के कारण हमारे अंदर दब जाता है और उचित समय आने पर किसी अन्य परिस्थिति जो हमारे मन के अनुकूल नहीं होती तब वह छिपा हुआ भय ही क्रोध के रूप में सामने आ जाता है।

हमारे अंदर रहने वाला क्रोध एक प्रज्वलित अग्नि के समान हमे अशांत बनाये रखता है, और यह हमारे स्वभाव का एक हिस्सा बन जाता है। क्रोध के सूक्ष्म रूप को द्वेष कहते है और यह हमारे अंदर धीमी अग्नि के समान सुलगता रहता है। अतः दूसरों के प्रति क्रोध और द्वेष भाव हमारे सबसे बढ़े शत्रु है। शास्त्र में आता है कि जो मनुष्य काम-क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन कर सकता है अर्थात उसके अनुसार प्रतिक्रिया नहीं करता, वही सुखी है और योगी है। द्वेष हमारे संस्कार में रहता है, क्रोध हमारे मन के अंदर रहता है और उसके कारण हिंसा की क्रिया बाहर समाज में देखी जाती है।

हमारे शरीर में स्थित मन हमारी इन्द्रियों और बुद्धि के बीच में स्थित रहता है। अतः यह इन्द्रियों से प्राप्त बाहरी विषयों का ज्ञान और बुद्धि से प्राप्त ज्ञान और उसका परिणाम दोनों से प्रभावित होता रहता है। इसलिए मन में सदा द्वन्द बना रहने के कारण यह अधिकांशत: अशांत रहता है और ध्यान आदि आंतरिक क्रिया या संसार के बाहरी विषयों में शांति की तलाश करता रहता है। जब हमारा मन, विवेकयुक्त बुद्धि के अनुसार कार्य करता है और काम-क्रोध आदि पर अपना नियंत्रण रखता है तब हम एक शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। और यदि विवेक के स्थान पर हमारी बुद्धि के अंदर कामनाएं प्रवेश कर जाती है तब हमारा मन इच्छाओं के अनुसार कार्य करता है चाहे वह उचित हो या अनुचित। और इच्छा के विपरीत स्थिति आने पर उसके अंदर क्रोध उत्पन्न होता है। ऐसी परिस्थिति में उसे धर्म-अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं रहता, बस वह केवल अपनी इच्छा की पूर्ति करना चाहता है। मनुस्मृति में आता है कि अधर्मी पहले अधर्म से बढ़ता है, फिर उससे अपना भला देखता है, फिर शत्रुओं को जीतता है और फिर जड़ सहित नष्ट हो जाता है।

अत: समाज में हिंसा को कम करने के लिए हमें अपने क्रोधित स्वभाव पर नियंत्रण रखना होगा। क्रोध हमें अंदर से मानसिक तनाव, अनिद्रा की स्थिति के द्वारा नुकसान पहुंचाता है और उसके परिणामस्वरूप हिंसा की क्रिया दूसरों को नुकसान पहुंचाती है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सबसे कहते है कि जो मनुष्य इच्छा, भय और क्रोध से सर्वथा रहित है वह सदा मुक्त ही है। कभी-कभी हमारा स्वभाव बन जाता है कि दूसरे मनुष्य हमारी इच्छा के अनुसार चलें या कार्य करें, यदि ऐसा नहीं होता तब हमें क्रोध आता है और हिंसात्मक क्रिया बाहर होती है। अत: अपनी इच्छा पूर्ति के लिए कर्म करने से पूर्व हमें भली भांति अपनी सामर्थ्य, परिणाम, दूसरों का हित-अहित आदि संबंधित विषयों पर भलीभाँति विचार कर लेना चाहिए और उनमें कोई विघ्न आने पर दूसरों पर क्रोध न करते हुए उस विपरीत परिस्थिति पर शांतिपूर्वक विचार करना चाहिए। क्रोध से किसी भी समस्या का हल नहीं निकलता और वह और अधिक जटिल हो जाती है, जिससे हमारा स्वयं का और समाज का अहित ही होता है।

डॉ. बी.के शर्मा

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