Thursday, October 8, 2026

माया, जीव और ईश्वर

‘रामायण’ का नाम तुलसीदास जी ने रामचरित मानस अर्थात् ‘राम के चरित्र’ मन से रचा है। परमात्मतत्व की जिज्ञासा रखने वाले जिज्ञासु जिस चिदानंदमय आत्मतत्व में नित्य रमण करते रहते हैं, वही राम शब्द से कहा जाता है और उसी को परब्रह्म कहते हैं। श्रीरघुनाथ जी की कथा को तुलसीदास जी ने अपने अंतःकरण के सुख के लिए अत्यन्त मनोहर भाषा रचना में रचना की है। अतः परमात्मा को प्राप्त करने के लिए बाहरी संसार समुद्र को पार करके अर्थात् बहिर्मुख से अंतर्मुखी होकर, अपने अंतःकरण अर्थात मानस में ही झांकना होगा। तुलसीदास जी ने मानस की दूसरी चौपाई में लिखा है कि श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्री पार्वती जी और श्री शंकर जी की मैं वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अंतःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते।

भगवान की मायाशक्ति के प्रभाव से हम बाहरी विषयों या दुनियादारी में ही आसक्त रहते हैं। कभी अंतःकरण में झांकने का समय ही नहीं मिलता। रामचरितमानस के उत्तरकांड में लक्ष्मण जी भगवान राम से कहते हैं कि ज्ञान, वैराग्य और माया का वर्णन कीजिए और उस भक्ति को कहिए जिसके कारण आप दया करते हैं तथा हे प्रभो, ईश्वर और जीव का भेद भी सब समझाकर कहिए, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम दूर हो जाये।

श्रीराम जी ने कहा, मैं थोड़े में ही सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि अर्थात् अंतःकरण को एकाग्र करके सुनो। ‘मैं और मेरा, तू और तेरा’ – यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है। **‘मैं अरु मोर तोर तैं माया, जिंहिं बस कीन्हे जीव निकाया’।** इन्द्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई, उस सबको माया जानना। इसके भी दो भेद हैं एक विद्या और दूसरी अविद्या।

एक अविद्या माया दुष्ट दोष युक्त है और अत्यन्त दुखद है जिसके वश होकर जीव संसार रूपी कुएँ में पड़ा हुआ है और एक विद्या जिसके वश में गुण हैं और जो जगत की रचना करती है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसका अपना बल कुछ भी नहीं है।

लक्ष्मण द्वारा पूछे गए 6 प्रश्नों में, पहला प्रश्न ज्ञान के विषय में, फिर वैराग्य, माया, भक्ति, ईश्वर और जीव के विषय में थे, लेकिन भगवान ने पहले माया के विषय में बतलाया, क्योंकि माया के वशीभूत होकर ही हम अपना पूरा जीवन व्यतीत करके, इस मनुष्य शरीर को छोड़ देते हैं। बाकी ज्ञान, वैराग्य, भक्ति आदि विषयों पर तो हम विचार ही नहीं कर पाते।

ज्ञान के विषय में प्रभु कहते हैं कि जहाँ मान अर्थात अपने में श्रेष्ठता का भाव न होना, दिखावटीपन का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, स्थिरता, मन का वश में होना, इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य का होना, अहंकार का भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियों में दुखरूप दोषों को बार-बार देखना, आसक्ति-रहित होना, पुत्र-स्त्री, घर आदि में घनिष्ठ सम्बन्ध न होना और अनुकूलता-प्रतिकूलता की प्राप्ति में चित्त का नित्य सम रहना, ईश्वर में अनन्य योग के द्वारा भक्ति का होना, एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव होना और जनसमुदाय में प्रीति का न होना, अध्यात्मज्ञान में नित्य निरन्तर रहना, तत्वज्ञान के अर्थ को परमात्मा को सब जगह देखना तथा जो सबमें समानरूप से ब्रह्म को देखता है, ऐसे सब ज्ञान के साधन कहलाते हैं, जिनके विषय में भगवान ने गीता के अध्याय 13 के श्लोक 7 से 11 तक कहा है।

जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों (सतगुण, रजोगुण, तमोगुण) को तिनके के समान त्याज्य समझता है उसी को परम वैराग्यवान कहना चाहिए। अर्थात जिसका आत्मा से अन्य जितने अनात्म पदार्थ, विषय आदि हैं उनमें राग या आसक्ति का न होना, सबसे अलग हो जाना ही वैराग्य कहलाता है। साधन चतुष्टय में विवेक के बाद वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षा आते हैं अतः साधक में विवेक से युक्त वैराग्य का होना अत्यन्त आवश्यक है। जीव और ईश्वर के प्रश्न के उत्तर में भगवान राम कहते हैं कि जो माया को, ईश्वर को और अपने स्वरूप को नहीं जानता, उसे जीव कहते हैं। जो कर्मानुसार बंधन और मोक्ष देने वाला, सबसे परे और माया का प्रेरक है वह ईश्वर है।

**माया ईस न आपुहुँ जान कहिअ सो जीव। बंध मोच्छ प्रद सर्वपर माया प्रेरक सीव।।**

**धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।। जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।।**

धर्म के आचरण से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है, तथा ज्ञान मोक्ष को देने वाला है, ऐसे वेदों में वर्णन किया है। और हे भाई जिसमें मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देने वाली है। यह भक्ति स्वतंत्र है, उसको ज्ञान-विज्ञान आदि किसी दूसरे साधन का सहारा नहीं है। सब ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात भक्ति अनुपम एवं सुख का मूल है और वह तभी मिलती है जब संत पुरुष अनुकूल होते हैं। जिनका कर्म, वचन और मन से मेरी ही गति है और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय कमल में मैं सदा विश्राम किया करता हूँ।

इसी तरह पक्षीराज गरुड़ जी ने रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में कागभुशुण्डी जी से सात प्रश्न पूछे:- सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है इसके उत्तर में कागभुशुण्डी जी कहते हैं कि मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। यह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है। ऐसे मनुष्य शरीर को प्राप्त करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं।

गरुड़ जी ने पूछा कि सबसे बड़ा दुख कौनसा है और सबसे बड़ा सुख कौन है? जिसके विषय में कागभुशुण्डी जी कहते हैं कि जगत में दरिद्रता के समान दुख नहीं है तथा संतों के मिलन के समान जगत में सुख नहीं है। फिर गरुड़ जी ने पूछा कि संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए। जिसके विषय में कहते हैं कि मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है। संत दूसरों की भलाई के लिए दुख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुख पहुँचाने के लिए। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं, किन्तु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और उन्हें बाँधने के लिए अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं। वे परायी सम्पत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्ट का अभ्युदय प्रसिद्ध अधम ग्रह (केतु) के उदय की भाँति जगत के दुख के लिए ही होता है। संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्य का उदय विश्वभर के लिए सुखदायक है।

आगे गरुड़ जी पूछते हैं कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान पुण्य कौन सा है और सबसे महान भयंकर पाप कौन है। उत्तर में आता है कि वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है। शंकर जी और गुरु की निन्दा करने वाला अगले जन्म में मेढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निन्दा करने वाला बहुत से नरक भोगकर, फिर कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है। जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निन्दा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निन्दा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया रहता है। जो पुरुष मनुष्य सबकी निन्दा करते हैं वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं।

गरुड़ जी अन्तिम सातवें प्रश्न में मानस रोगों के विषय में पूछते हैं जिसके उत्तर में काकभुशुण्डि जी कहते हैं—

**मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला। काम वात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।**

सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ बढ़ा हुआ कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है। यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें तो दुखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से पूर्ण होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं वे ही सब कष्टदायक रोग हैं, वे अपार हैं। ममता दाद है, ईर्ष्या खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है। पराये सुख को देखकर जो जलन होती है वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है। अहंकार अत्यन्त दुख देने वाला गाँठ का रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नसों का रोग है। तृष्णा बड़ा भारी जलोदर रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी अर्थात मलेरिया, बुखार की तरह हैं। मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। ये रोग निरन्तर जीव को कष्ट देते रहते हैं। ऐसी दशा में वह समाधि (शान्ति) को कैसे प्राप्त करे। मन को निरोग हुआ तब जानना चाहिए, जब हृदय में वैराग्य का बल बढ़ जाये। उत्तम बुद्धि रूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयों की आशारूपी दुर्बलता मिट जाये। इस प्रकार सब रोगों से छूटकर जब मनुष्य निर्मल ज्ञानरूपी जल में स्नान कर लेता है, तब उसके हृदय में रामभक्ति छा जाती है। श्री रघुनाथ जी की भक्ति के बिना सुख नहीं है।

**डॉ. बाल कृष्ण शर्मा**

Website: Peacefulmindandlife.com

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