Thursday, July 9, 2020

कर्तापन के अभिमान का त्याग - 09-07-2020


 व्यवहारिक गीता ज्ञान               

भगवान गीता के मोक्ष सन्यास योग नामक अध्याय 18 के श्लोक 16 एवं 17 में कर्तापन का अभिमान और उसके त्याग के विषय में बतलाते हुए कहते हैं ।

    तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।

    पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।

परंतु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता मानता है वह मलिन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता।

यश्य नाह्रडकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।

   हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।।

जिस पुरुष के अंतःकरण में “ मैं कर्ता हूं” ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होतीवह पुरुष इन सब लोकों  को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न पाप से बंधता है ।

मनुष्य मनवाणी और शरीर द्वारा जो कुछ भी कर्म करता है उसके भगवान ने गीता में पाँच कारण, अधिष्ठान (शरीर)कर्ताकरण (इंद्रियाँ)नाना प्रकार की चेष्टाएँ और दैव (प्रारब्ध) बताए हैं । पाँच ज्ञानेंद्रियाँपाँच कर्मेंद्रियाँ और अंतःकरण (मनबुद्धिअहंकार) यह 13 करण (साधन) कर्म करने के लिए हैं। यह सभी करण प्रकृति का अंश है अर्थात जड़ हैं जबकि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप (आत्मा) चेतन और परमात्मा का अंश हैअतः चेतन और जड़ पदार्थ दोनों ही भिन्न है । जीव अनंत काल से अनंत शरीरों में रहता आया है इसलिए अज्ञान के कारण उसने अपने आपको शरीर ही मान लिया है और इसी संबंध के कारण वह बंधन में पड़कर बार-बार जन्म मृत्यु के चक्र में पड़ गया है। गीता के श्लोक 3/27 में भगवान कहते हैं कि वास्तव में संपूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों (सत्वगुणरजोगुणतमोगुण) द्वारा किए जाते हैं तो भी जिसका अंतःकरण अहंकार से मोहित हो रहा हैऐसा अज्ञानी मैं कर्ता हूँ” ऐसा मानता है । और श्लोक 13/29 में भगवान कहते हैं कि जो पुरुष संपूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता हैवही यथार्थ देखता है।

हम देखते हैं कि मनुष्य मनबुद्धिचित्त और अहंकार जो उसका अंतःकरण है उसके द्वारा कर्तव्य (कर्म) का अनुमान करता हैजिसमें उसके अंतःकरण में संचित संस्कार और उसका स्वभाव और गुण का विशेष महत्व होता है। यदि उसे यह निश्चय होता है कि उस कर्तव्य का पालन सुख का कारण है तब वह अपनी सभी दस इंद्रियों को उस काम में नियुक्त कर देता है। और यदि उसे यह अनुभव होता है कि वह कर्तव्य दुख का कारण होगा तब वह तत्क्षण ही अपनी दसों इंद्रियों से उसका त्याग करने में लग जाता है। मनुष्य अपने समस्त कार्यों में इंद्रियों को यंत्रों की भांति लगाये रखता है और इसी कारण इन इंद्रियों को करण यानी साधन अथवा यंत्र नाम से कहा गया है। कर्ता इन करणों का उपयोग करके जो क्रियाएँ करता है उन क्रियाओं को ही कर्म कहते हैं। अब यदि कर्ता आसक्ति रखकरकामनाममता और फल की इच्छा रखकर कर्म करता है तब वह कर्मबंधन में पड़ जाता है और यदि निर्लिप्त और निष्काम भाव सेकर्तापन का अभिमान न रखते हुए, कर्म की सफलता या असफलता में समान भाव रखकरधैर्य और उत्साह के साथ कर्म करता है तब वह कर्म करते हुए कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।

हमने देखा कि कर्म के होने में पाँच कारण है इसमें आत्मा या मनुष्य का वास्तविक स्वरूप का कर्मों के साथ कोई संबंध नहीं है इसलिए आत्मा को कर्ता मानना उचित नहीं है। कर्म का आरंभ और अंत होता हैपदार्थों की उत्पत्ति और विनाश होता है लेकिन आत्मा तो नाशरहितनित्यअजन्मासनातन और पुरातन एवं विकाररहित है। भगवान ने उपरोक्त श्लोक में कहा है कि जो मनुष्य आत्मा को कर्ता मानता है उसकी बुद्धि मलिन हैअशुद्ध है और वह अज्ञानी है। और जिस पुरुष के अंतःकरण में कर्म करते हुए भी कर्ता भाव नहीं है, वह जानता है कि सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा ही हो रहे हैं और उसका शरीर एवं इंद्रियाँ आदि भी प्रकृति का ही अंश है और वह स्वयं परमात्मा का अंश हैवह कर्म बंधन से मुक्त रहता है। इसके विपरीत जब मनुष्य प्रकृति द्वारा संपादित क्रियाओं में मिथ्या अभिमान करके स्वयं उन कर्मों का कर्ता बन जाता है तब वह कर्म, फल देने वाले बन जाते हैं क्योंकि मनुष्य ने अपना संबंध कर्म के साथ आसक्ति और अज्ञान के कारण जोड़ लिया है। इसलिए ऐसे प्रकृतिस्थ पुरुषों को अच्छी - बुरी योनियों में उसके द्वारा किए गए कर्म के आधार पर जन्म धारण करके उन कर्मों का फल भोगना पड़ता है । इसलिए पाँच कारण में से एक कर्ता है जो कि प्रकृति में स्थित पुरुष है। यदि वह निर्लिप्त और निष्काम भाव रखता है एवं आसक्ति और कामना से रहित है तब वह कर्म करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता और उसे उन कर्मों का फल भी नहीं भोगना पड़ता क्योंकि उसका लक्ष्य तो कर्मों को ईश्वर को अर्पण करके संसार के हित के लिए ही करना है, उसका अपना तो उनमें कोई स्वार्थ नहीं होता। इसके लिए कर्म योग के द्वारा अंतःकरण को शुद्ध करते रहने का प्रयास करते रहना चाहिए। अंतःकरण जिसमें मनबुद्धिचित्त और अहंकार आते हैं वह जब शुद्ध हो जाते हैं अर्थात उसको ज्ञान हो जाता है तब उसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में लिप्त नहीं होती और वह निर्लिप्त भाव से अपने कर्तव्य कर्म लोक हित के लिए करता है। अतः हमें कर्म करते हुए कर्तापन का अभिमान नहीं रखना चाहिए कि मैं ही यह सब कर्म कर रहा हूँ। हमें यह दुर्लभ मनुष्य शरीर पाकर अपने उद्धार के लिए प्रयासरत रहना चाहिए यही हमारे जन्म का मुख्य उद्देश्य है।

   धन्यवाद

 डॉ. बी. के. शर्मा

Saturday, July 4, 2020

कर्मों की सिद्धि के पाँच कारण - दिनांकः- 05.07.20

व्यावहारिक गीता ज्ञान                         


मनुष्य शरीर कर्म प्रधान है। जब हमारे अंदर कुछ पाने की इच्छा होती हैतब हमारी कर्म करने में प्रवृत्ति होती है। कर्म को दो भागों में विभक्त किया गया है । पहला यदि हम फल और कामना का भाव न रख कर अपना कर्म निष्काम भाव से करें तब वह कर्तव्य कर्म है और दूसरा यदि हम कामना या फल की इच्छा रखते हुए सकाम भाव से करें तब वह अकर्तव्य कर्म है। कर्तव्यकर्म करते हुए हम कर्म बंधन से मुक्त रहते हैं और  अकर्तव्य कर्म द्वारा हम कर्म बंधन में पड़ते हैं और बार- बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़े रहते हैं।


भगवान ने गीता के मोक्ष सन्यास योग नामक अध्याय अट्ठारह के श्लोक 13 में कहा है कि संपूर्ण कर्मों की सिद्धि के पांच हेतु (कारण) कर्मों का अंत करने के लिए उपाय बताने वाले सांख्यशास्त्र में कहे गए हैं। और श्लोक 15 में भगवान कहते हैं कि मनुष्य मनवाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं।


मनुष्य जितने भी पुण्य-पाप रुपी कर्म करता है, उन्हें शास्त्रों में तीन श्रेणी में बाँटा है। कायिक (शरीर द्वारा किये जाने वाले), वाचिक (वाणी द्वारा) और मानसिक (मन-बुद्धि द्वारा किये जाने वाले) अर्थात् सभी अच्छे या बुरे कर्म शरीर, वाणी और मन इन्हीं तीनों की प्रधानता से होने वाले हैं। इसलिए भगवान ने गीता के अध्याय 17 में शरीर, वाणी और मन सम्बन्धी तप की बात कही है, ताकि इनके द्वारा होने वाले कर्म भी शुद्ध हों। हमें प्रिय और दूसरों के लिए हितकारी वाणी बोलनी चाहिए और अपने मन को शान्त और पवित्र रखना चाहिए ताकि हमारे विचार (अंतःकरण) शुद्ध होकर हमारे द्वारा निष्काम कर्म हो सकें।


भगवान गीता के अध्याय 18 के श्लोक 14 में कर्मों की सिद्धि में पाँच हेतु (कारण) बताते हुए कहते हैं-


अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।

विविधाच्श्र पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्।।


इस विषय में अर्थात् कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवा हेतु दैव है।


हम शरीर, मन और वाणी द्वारा जो भी कर्म करते हैं इसके निम्नलिखित पाँच कारण भगवान ने गीता में बतलाये हैं।


(1)  अधिष्ठान अर्थात् शरीर जो कि सभी क्रियाओं का आधार है। हम अपने शरीर द्वारा ही मुख्य रुप से कर्म करते हैं। हमारी सभी इन्द्रियों और कर्ता का आधार शरीर ही है। हमारा शरीर पाँच महाभूतों आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से बना है। और अंत में इन्हीं में विलीन हो जाता है। इन पाँच महाभूतों के पाँच विषय हैं शब्द, स्पर्श, रुप, रस और गन्ध। इन सबका नाम ही कार्य है- इच्छा-द्वेष, सुखःदुख और ज्ञान आदि की अभिव्यक्ति का आश्रय भी शरीर ही है। इसलिए पहला कारण तो शरीर है।


(2)  दूसरा कारण है कर्ता, जिस पर हमें विचार करने की आवश्यकता है। जीवात्मा जो शरीर में रहती है वह तो नित्य, आनन्दस्वरुप, चेतन (दृष्टा) और ईश्वर का अंश है। वह तो इस शरीर के पहले भी किसी दूसरे शरीर में रहती थी और इस शरीर की मृत्यु के बाद भी वह इसे छोड़कर चली जायेगी और तब तक अनेक शरीर धारण करती रहेगी जब तक उसे यह ज्ञान नहीं हो जायेगा कि वह तो मुक्त स्वरूप ही है- केवल अज्ञान के कारण उसने अपना संबंध प्रकृति (शरीर) के साथ मान रखा था। जीवात्मा तो प्रकृति और उसके कार्य से भिन्न एवं अत्यन्त विलक्षण होने पर भी प्रकृति के संबंध से कर्ता और भोक्ता बनकर अज्ञान के कारण सुख-दुख का भोग करता रहता है। जब जीवात्मा अपना संबंध प्रकृति (शरीर) के साथ मान लेता है तब देखना, सुनना, समझना, खाना, पीना आदि समस्त क्रियाओं को वह अपने द्वारा किया जाने वाले समझता है। जबकि वास्तव में यह सब कार्य प्रकृति में स्थित इन्द्रियाँ आँख, नाक, कान, हाथ, पैर, मन, बुद्धि आदि द्वारा हो रहे हैं। भगवान ने गीता के श्लोक (5/8-9) में कहा है कि तत्व को जानने वाला साँख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता हुआ और मुँदता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में वरत रही है- इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा माने कि में कुछ भी नहीं करता हूँ। वास्तव में कुछ जगह तो हम सभी ऐसा ही मानते हैं जैसे श्वास लेते हुए, भोजन को पचाने में, खून और अन्य रसों का शरीर में बनना, आँखों का द्वारा पलक झपकना और शरीर के अन्दर की अन्य क्रियाओं में हमारा कर्ताभाव नहीं होता कि हम ही कर रहे हैं, यह तो इन्द्रियों द्वारा ही हो रहा है। लेकिन बाकी कार्य को इन्द्रियों द्वारा होते हुए भी हम मानते है कि यह सब कार्य हम ही कर रहे हैं और इसी कर्ताभाव के द्वारा हम कर्मबन्धन में पड़ जाते हैं। जबकि हम तो जैसे स्वप्न अवस्था और सुषुप्ति अवस्था में साक्षी रहकर कहते है कि मैंने स्वप्न देखा या बड़ी गहरी निंद्रा में सोया उसी प्रकार जाग्रत अवस्था में भी साक्षी भाव रखकर हम इन्द्रियों द्वारा होने वाले कार्य को अनुभव कर सकते हैं। हमें तो अपनी बुद्धि (करण) को विवेक संपन्न बना देना चाहिए ताकि यह अपने लक्ष्य की ओर ध्यान रखती हुई निपुणता के साथ इन्द्रियों को सन्मार्ग पर चलाने के लिए मन को बाध्य करता रहे। कर्म संग्रह के तीन प्रकार हैं कर्ता, करण और क्रिया। अगर इसमें से कर्ता अलग हो जाये तब क्रिया और उसके होने वाले साधन (करण) ही रह जायेगें और कर्म होते हुए भी कर्म संग्रह नहीं होगा और जीव उस कर्म बन्धन से मुक्त हो जायेगा। अतः कर्ताभाव रखना ही कर्म संग्रह का कारण बन जाता है। जब जीव अपना संबंध शरीर के साथ रखता है तब वह कर्म का कर्ता बन जाता है इसलिए दूसरा कारण कर्म की सिद्धि में कर्ता को बताया है।


(3)  तीसरा कारण है भिन्न-भिन्न करण अर्थात् कर्म करने के साधन। जिन-जिन इंद्रियादि और साधनों के द्वारा कर्म किये जाते हैं उनका नाम करण है। और करने का नाम क्रिया है।पांच ज्ञानेन्द्रियां श्रोत्रत्वचारसनानेत्र और घ्राण एवं पांच कर्मेंद्रियां वाकहस्त, पादउपस्थ और गुदा तथा अंत:करण मनबुद्धिअहंकारइन 13 का नाम करण है। अर्थात् कर्म करने का तीसरा कारण यह 13 साधन हैं। और इनके अतिरिक्त भी जो अन्य साधन कर्म के लिए उपयुक्त हैं वह भी करण की श्रेणी में ही आ जाते हैं। अत: हम देखते हैं कि कर्ता और करण अर्थात् कर्म करने के साधन दोनों ही अलग हैं लेकिन जब कर्ता अपना संबंध करण अर्थात् इन्द्रियों के साथ कर लेता है या स्वयं को ही इन्द्रियां मान लेता है तब वह कर्म बन्धन में पड़ता है।


    महाभारत पुराण में ब्रह्माजी ने अनुगीता के अंतर्गत पंच महाभूतों और इन्द्रियों आदि के विषय में बताया है कि अहंकार से पृथ्वीवायुआकाशजल और तेज़ ये पंच महाभूत उत्पन हुए है। इन्हीं पंचमहाभूतों में अर्थात् इनके शब्दस्पर्शरुपरसगंध नामक विषयों में समस्त प्राणी मोहित रहते हैं। आकाश पहला भूत है। कान उसका अघ्यात्म (इन्द्रिय)शब्द उसका अधिभूत (विषय) और दिशायें उसकी अधिदैवत (अधिष्ठातृ देवता) है। वायु दूसरा भूत हैत्वचा उसका अध्यात्मस्पर्श उसका अधिभूत और विधुत उसका अधिदैवत है। तेज तीसरा भूत हैनेत्र उसका अध्यात्मरूप उसका अधिभूत और सूर्य उसका अधिदैवत् है। जल चौथा भूत हैरसना उसका अध्यात्मरस उसका अधिभूत और चंद्रमा उसका अधिदैवत् है। पृथ्वी पाँचवा भूत हैनासिका उसका अध्य़ात्मगन्ध उसका अधिभूत और वायु उसका अधिदैवत् है। इसी प्रकार पाँच कमेन्द्रिया के विषय में बताया है। जैसे पैरों को अध्यात्म कहते है और गन्तव्य स्थान को उनके अधिभूत तथा विष्णु उनके अधिदैवत् हैं। दोनों हाथ अध्यात्म हैकर्म उनके अधिभूत तथा इन्द्र उनके अधिदैवत् है। वाणी अध्यात्म है और वक्तव्य उसका अधिभूत तथा अग्नि उसका अधिदैवत् है। पँचभूतों का संचालन करने वाला मन अध्यात्म हैसंकल्प उसका अधिभूत है और चँद्रमा उसके अधिष्ठाता देवता है। संपूर्ण संसार को जन्म देने वाला अहंकार अध्यात्म है और अभिमान उसका अधिभूत तथा रूद्र उसके अधिष्ठाता देवता है। विचार करने वाली बुध्दि अध्यात्म हैमन्तव्य उसका अधिभूत है और ब्रहमा उसके अधिदैवता है। इंद्रियाँउनके विषय और पँचमहाभूतों की एकता का विचार करके उसे मन में अच्छी तरह धारण कर लेना चाहिए। अतः हम यह जान जाते है कि कर्ता का इन्द्रियाँउनके विषय और पँचमहाभूत से संबंध नही हैकर्ता स्वंतत है और साक्षी भाव से इन सबको देख सकता है। लेकिन कर्ता जब अपना संबंध करण के साथ कर लेता है तब कहता है कि सभी कर्म मैं ही कर रहा हूँ।

    

    (4) चौथा कारण हैनाना प्रकार की भिन्न-भिन्न चेष्टाएँ। कर्म करने के जो करण या साधन है उनके द्वारा कर्म करने की चेष्टा करना जैसे पैरों के द्वारा चल कर कार्य के लिए जाना या किसी बाहरी साधन का उपयोग करनाहाथों का और बाकी इंद्रियों का कर्म में उपयोग करने की चेष्टा करनामन और बुद्धि के द्वारा कार्य को सफल करने का प्रयास  करना आदि आदि । अर्थात कर्म को पूरा करने के लिए जितनी भी हम चेष्टा कर सकते हैं उसमें कोई कमी न रखना।


    (5) पाँचवा कारण दैव अर्थात प्रारब्ध है। जो हमारे संचित कर्म है उनके द्वारा ही हमारे अंतःकरण में संस्कार बनते हैं और हम वैसा ही कर्म करते हैं और संचित कर्म में से जो कर्म प्रारब्ध रूप से फल देने के लिए हमारे सामने आते हैं उसी के अनुसार हमें वर्तमान में फल मिलता है। अतः कर्म करने में तो हम स्वतंत्र है लेकिन फल क्या होगा यह हमारे हाथ में नहीं हैइसीलिए गीता में बार-बार आता है कि फल और कामना की इच्छा से रहित होकर अपने कर्तव्य कर्म करें ।
    

    उपरोक्त श्लोक में कर्म की सिद्धि में पांच हेतु (कारण) बताए हैं अधिष्ठान अर्थात आधार (शरीर) जिसके बिना कोई कार्य नहीं हो सकता। कर्ता अर्थात क्रिया करने वाला यदि वह अपना संबंध शरीर के साथ रखता है या निष्काम भाव से अहंकार रहित होकरईश्वर अर्पण बुद्धि द्वारा, कर्तापन के अभिमान से रहित होकर अपना कार्य करना जिससे वह कर्म करता हुआ भी उससे मुक्त रह सके। कर्म करने के विभिन्न साधन अर्थात करण और नाना प्रकार की कर्म करने की चेष्टाएं। यदि हमारे पास साधन तो हों लेकिन हम चेष्टा न  करें तब कर्म कैसे होंगे अर्थात पूरी चेष्टा के साथ अपने कर्म करना और पांचवा प्रारब्ध (दैव) है। कभी-कभी हम देखते हैं कि सब कुछ ठीक प्रकार से करने पर भी हमें सफलता नहीं मिलती और कभी थोड़ा भी करने पर सफल हो जाते हैं इसी में हमारा प्रारब्ध आ जाता है। लेकिन पांच में से चार तो हमारे हाथ में ही हैं अतः हमें अपने कार्य पूरी इमानदारीमेहनत और पूरी चेष्टा के साथ अपने सभी साधनों का उपयोग करते हुए निष्काम भाव से करने चाहिए। जब हम फल की इच्छा ही नहीं रखेंगे तब जो भी ईश्वर की इच्छा होगी उसी को प्रारब्ध मानकर हमें प्रसन्न रहना चाहिए। हमें सुखी या दुखी ज्यादा नहीं होना चाहिए। जब हमारे ही संचित कर्म हमारे सामने प्रारब्ध बनकर आते हैं तब किसी अन्य को हम दोष क्यों देते हैं। हम अपना नियत कर्म शास्त्रानुसार करते रहेंइसी में हमारा कल्याण निहित है।

 

                                                           धन्यवाद

 डॉ. बी. के. शर्मा

Tuesday, June 30, 2020

कर्मफल के त्याग से लाभ - 30.06.2020

व्यावहारिक गीता ज्ञान


भगवान गीता के अध्याय 18 के श्लोक 12 में कर्मफल के त्याग से होने वाले लाभ को बताते हैं:

 

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधिं कर्मण: फलम् ।

भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्यासिनां कव्चित् ।।


       कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा-बुरा और मिला हुआ ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात अवश्य होता है ,किंतु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्य के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता। 

       हम शरीरमन और वाणी द्वारा जो क्रिया करते हैं- वह कर्म कहलाता है। पांच महाभूतों (आकाशवायु ,अग्निजल ,पृथ्वी )से बना हुआ कर्मजन्य सुख -दुखादि भोगों के आयतन को स्थूल शरीर कहते हैं। अस्ति (व्यवहार योग्य होना)उत्पन्न होता हैबढ़ता है ,रूपांतर को प्राप्त होता है ,घटता है और नष्ट हो जाता है । ऐसे छः विकारों से युक्त  स्थूल शरीर है। यह जन्म से मृत्यु तक परिवर्तनशील है। शरीर का संबंध प्रकृति के साथ है जबकि हमारा संबंध ईश्वर के साथ है। हमारा स्वरूप (आत्मा) परिवर्तन रहित हैजबकि प्रकृति सदा परिवर्तनशील है। जब प्रकृति (शरीर ,मन ,बुद्धि )आदि में होने वाली क्रिया को हम अपने में मान लेते हैं अर्थात उनके साथ अपना संबंध स्थापित कर लेते हैं तब हम कर्म के साथ बंध जाते हैं और उसका फल भी हमें ही भुगतना पड़ता है।  पांच ज्ञानेंद्रियां ,पांच कर्मेंद्रियां,  पांच प्राण ,मन और बुद्धि ऐसे 17 कलाओं के सहित जो रहता है वह सूक्ष्म शरीर है ।

भगवान ने गीता के श्लोक (13/20) में कहा है कि कार्य और करण को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख दुखों के भोगने में हेतु कहा जाता है। पांच महाभूत और उनके विषय (शब्दस्पर्शरूपरस और गंध) का नाम कार्य हैऔर पांच ज्ञानेंद्रियां ,पांच कर्मेंद्रियां और मनबुद्धिअहंकार (अंत:करण) इन 13 का नाम करण है। अत: कार्य और उनके करने के साधन (करण) सब प्रकृति के ही अंश हैं। हम उनके साथ अपना संबंध रखकर उनसे बंध जाते हैं। यदि हम अपने कर्तव्यकर्म भगवान की आज्ञानुसार अर्थात जैसा कि भगवान ने हमें गीता में और अन्य शास्त्रों में कर्म करने की विधि बताई हैआसक्ति और फल की इक्छा का त्याग करते हुए करें उसमें कर्तापन का अभिमान न रखेंपूर्ण निष्काम भाव से दूसरों के हित की दृष्टि रखते हुए करें तब हम कर्म बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

भगवान ने गीता के श्लोक (18 /11 )में कहा है कि शरीरधारी किसी भी मनुष्य के द्वारा संपूर्णाता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं हैइसलिए जो कर्मफल का त्यागी है वही त्यागी है - यह कहा जाता है । श्लोक (12/12) में भगवान कहते हैं कि मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है ,ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से भी सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है  क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शाँति होती है। जो शास्त्रविहित कर्तव्य कर्म आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है- वही सात्विक त्याग कहा जाता है। भगवान ने गीता के अनेकों श्लोकों में कर्मफल के त्याग के विषय में हमें बताया है।

कर्म तीन प्रकार के होते हैं- क्रियमाणसंचित और प्रारब्ध। जो कर्म हम अभी वर्तमान समय में करते हैं वह क्रियमाण कर्म है और वर्तमान से पहले इस जन्म में और पूर्व जन्म में हमारे द्वारा किए गए कर्म संचित कर्म कहलाते हैं और संचित कर्म में से जो कर्म हमारे सामने फल देने के लिए सामने आते हैं वह प्रारब्ध कर्म हैं। हमारे द्वारा तीन तरह से कर्म होते हैं (1) शुभ (पुण्य) कर्मजिनका फल सुख या अनुकूल परिस्थिति होती है जो हमें अच्छी लगती है अर्थात् इनका अच्छा फल मिलता है। (2) बुरे (पाप) कर्म जिनका फल दुख या प्रतिकूल परिस्थिति जो हमें बुरी लगती है अर्थात बुरा फल मिलता है। (3) मिश्रित (पुण्य-पाप) कर्म जिनका फल कभी अच्छा और कभी बुरा अर्थात अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति का आना-जाना जैसा कि मनुष्य जन्म में होता रहता है। हम शुभ कर्म के कारण उच्च लोकों में जाते हैं और अशुभ कर्म के कारण पशु पक्षी योनियों में जाते हैं तथा मिश्रित कर्म के कारण मनुष्य जन्म लेकर सुख-दुख प्राप्त करते रहते हैं। अर्थात कोई भी कर्म करने से पहले हम स्वतंत्र हैं उसे करने के लिए अतः विचारपूर्वक ही कर्म करने चाहिए यह नहीं जो मन में आया कर लिया। कर्म करने के बाद वह हमारे अंतःकरण में संचित हो जाता है और फल रूप में हमारे सामने आता है। और इन्हीं कर्मों के कारण हमारे संस्कार बनते हैं और स्वभाव बनता है और हमारा जीवन भी वैसा ही बन जाता है।

यदि हम अपने कर्म, फल की इच्छा न रखते हुए अर्थात फल का त्याग करके करें अर्थात कामनाआसक्तिममता आदि  न रखकर भगवान को ही अर्पण करके और भगवान को ही संसार का मालिक मानकर लोकहित की दृष्टि से करें तब जैसा भगवान ने कहा है कि ऐसे मनुष्यों को कर्म का फल किसी काल में भी नहीं होता अर्थात वह कर्मबंधन से मुक्त हो जाती हैं। भगवान ने गीता में इस शरीर को क्षेत्र अर्थात खेत कहा हैजैसे खेत में हम जो भी बीज डालते हैं वह समय आने पर वृक्ष बनकर फल देता है लेकिन हम यदि उस बीज को अग्नि में भून लें और खेत में डालें तब वह न तो वृक्ष बनेगा और न फल देगा। इसी प्रकार हम यदि अपने कर्म ज्ञान के साथ करें जैसा कि शास्त्रों में भगवान ने कहा है तब हमारे कर्म भी ज्ञान की अग्नि में भस्म होकर कोई अच्छाबुरा या मिश्रित फल किसी भी काल में नहीं देंगे और हम कर्म करते हुए कर्म बंधन से मुक्त होकर इस जन्म मृत्यु के आवागमन से मुक्त होकर परमपद की प्राप्ति कर लेंगे। यह केवल मनुष्य जन्म में ही ज्ञान द्वारा संभव हैबाकी सभी तो केवल भोग योनियाँ हैं। अतः हमें अभी सचेत हो जाना चाहिएजो समय हमारे जीवन का व्यतीत हो गया है वह तो अब वापस  नहीं आ सकता लेकिन अभी भी जो बचा है उसका तो हम आज से ही सदुपयोग करके अपना उद्धार कर सकते हैं ताकि हमारा मनुष्य जन्म लेना सफल हो सके।

                                      धन्यवाद

                                     डॉ. बी. के. शर्मा


Friday, June 26, 2020

ईश्वर अर्पण बुद्धि से कर्म करना - 26.06.2020

व्यावहारिक गीता ज्ञान


भगवान ने गीता के अध्याय 11 के श्लोक 55 में ईश्वर अर्पण बुद्धि से कर्म करते हुएअनन्यभक्ति द्वारा किस प्रकार मनुष्य परमात्मा को प्राप्त होता है के विषय में बताया है।


मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सग्ङवर्जितः।

निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।।

हे अर्जुन! जो पुरुष मेरे ही लिए संपूर्ण कर्तव्यकर्मों को करने वाला हैमेरे परायण हैमेरा भक्त हैआसक्तिरहित है और संपूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित हैवह अनन्यभक्ति युक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।

इस श्लोक में भगवान को प्राप्त पुरुष के पांच लक्षण बताएं हैं।


(1)    जो अपने समस्त शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म केवल ईश्वर अर्पण बुद्धि से ही करता हो। उदाहरण के लिए हम शरीरमन और वाणी द्वारा जो क्रिया करते हैं वह कर्म कहलाता है। पंच  महाभूतों (पृथ्वीजलअग्निवायुआकाश) से बना यह स्थूल शरीर और मनबुद्धि और अहंकार इस प्रकार यह आठ प्रकार के भेद वाली प्रकृति को भगवान ने अपरा अर्थात जड़ प्रकृति  कहा है। और इससे दूसरी को जिससे यह संपूर्ण जगत धारण किया जाता है वह जीवरूपा परा अर्थात चेतन प्रकृति है। जैसे किसी यंत्र को काम करने के लिए बिजली रूपी शक्ति की आवश्यकता होती है उसी प्रकार जड़ प्रकृति के अंश शरीर को कार्य करने के लिए चेतन (प्राण) शक्ति की आवश्यकता है। जब तक प्राण शक्ति हमारे अंदर हैं तब तक ही हमारा शरीर कार्य करता है उसके निकल जाने के बाद यह हिल भी नहीं सकता। अर्थात हमारा वास्तविक स्वरूप (आत्मा) जो ईश्वर का अंश है उसी की शक्ति के द्वारा हमारा शरीरबुद्धिइंद्रियाँ आदि कार्य करती हैं। तब यदि हम यह मान लें कि इस सबका कर्ता मैं ही हूँ तब यह हमारा अज्ञान ही है। अतः हम अपना शास्त्रविहित  नियत कर्म स्वार्थ रहित होकरनिर्लिप्त और  निष्काम भाव से अपने अंतःकरण द्वारा ईश्वर को अर्पण बुद्धि से संसार की सेवा या लोकहित के लिए करते रहे। भगवान ने गीता के श्लोक 5/10 कहा है कि जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भांति पाप से लिप्त नहीं होता 

(2)    जो भगवान के परायण हो अर्थात भगवान को ही परम आश्रय या एकमात्र शरण लेने योग्य मानता हो। अर्थात जो संसार का आश्रय ना लेकर केवल एकमात्र भगवान का ही आश्रय लेता हो जिसका वह अंश है और अंत में उसी में मिल जाना हैवह तो उससे अनन्त जन्मों से बिछड़ने के कारण उसे भूल गया है और अपने को शरीर मानकर उससे बँधकर बार-बार अनेकों शरीरों में आता जाता रहता है। श्रीमद्भागवत के एकादश स्कंध में भगवान श्री कृष्ण उद्धव जी से कहते हैं कि शरीर एक वृक्ष हैइसमें हृदय का घोंसला बनाकर जीव और ईश्वर नाम के दो पक्षी रहते हैं। वे दोनों चेतन होने के कारण समान है और कभी ना बिछड़ने के कारण सखा है। इनके निवास करने का कारण केवल लीला ही है। इतनी समानता होने पर भी जीव तो शरीर रूपी वृक्ष के फल सुख दुख आदि भोगता है परंतु ईश्वर उन्हें न  भोगकर कर्मफल सुख-दुख आदि से असंग और उनका साक्षी मात्र रहता है। अभोक्ता होने पर भी ईश्वर की यह विलक्षणता है कि वह ज्ञानऐश्वर्यआनंद और सामर्थ्य आदि में भोक्ता जीव से बढ़कर है। साथ ही एक विलक्षणता यह भी है कि  अभोक्ता ईश्वर तो अपने वास्तविक स्वरूप और इसके अतिरिक्त जगत को भी जानता है परंतु भोक्ता जीव  न अपने वास्तविक स्वरूप को जानता है और न अपने से अतिरिक्त को। इन दोनों में जीव तो अविद्या से युक्त होने के कारण नित्यबद्ध  है और ईश्वर विद्यास्वरूप होने के कारण नित्यमुक्त हैं। ज्ञान संपन्न पुरुष भी मुक्त ही है जैसे स्वप्न टूट जाने पर जगा हुआ पुरुष स्वप्न के शरीर से कोई संबंध नहीं रखता वैसे ही ज्ञानी पुरुष सूक्ष्म और स्थूल शरीर में रहने पर भी उनसे किसी प्रकार का संबंध नहीं रखता। परंतु अज्ञानी पुरुष वास्तव में शरीर से कोई संबंध न रखने पर भी अज्ञान के कारण शरीर में ही स्थित रहता है जैसे स्वप्न देखने वाला पुरुष स्वप्न देखते समय स्वप्न के शरीर से बँध जाता है। व्यवहारादि इंद्रियां शब्दस्पर्श आदि विषयों को ग्रहण करती है क्योंकि यह तो नियम ही है कि गुण ही गुणों को ग्रहण करते हैंआत्मा नहीं। इसलिए जिसने अपने निर्विकार आत्मस्वरूप को समझ लिया है वह उन विषयों के ग्रहण त्याग में किसी प्रकार का अभिमान नहीं करता। यह शरीर प्रारब्ध के अधीन है। इससे शारीरिक और मानसिक जितने भी कर्म होते हैं सब गुणों की प्रेरणा से ही होते हैं। अज्ञानी पुरुष झूठमूठ अपने को उन ग्रहण त्याग आदि कर्मों का कर्ता मान बैठता है। और इसी अभिमान के कारण वह बँध जाता है। जिनके प्राणइंद्रियांमन और बुद्धि की समस्त चेष्टाएं बिना संकल्प के होती है वे देह  में स्थित रहकर भी उसके गुणों से मुक्त है।

(3)    जो भगवान का भक्त होअर्थात भगवान के अलावा किसी अन्य का चिंतन न करता हो। भगवान के गीता के श्लोक 12/13 में भक्त के लक्षण बताये हैं कि जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहितस्वार्थरहितसबका प्रेमीऔर हेतुरहित दयालु है तथा ममता से रहितसुख-दुखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है तथा जो योगी निरंतर संतुष्ट होमन, इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है- वह मुझमें अर्पण किये हुए मन बुद्धि वाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है।(4)    जो आसक्ति से रहित हो अर्थात् निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा अपने कर्त्तव्यकर्म को करता हो। क्योंकि भगवान ने गीता के श्लोक 3/19 में कहा है कि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।

(5) जो किसी भी प्राणी के साथ वैरभाव न रखता हो अर्थात् सभी में परमात्मा को ही दर्शन करता हो और सभी के साथ द्वेषभाव से रहित हो। हम देखते हैं कि यदि कोई हमारा अहित करता है या हमें दुख पहुँचाता है उसके साथ हम द्वेषभाव रखने लग जाता है, वह हमें बुरा लगता है।

 

अध्यात्मरामायण में आता है

सुखस्य दुखस्य न कोअपि दाता

परो ददातिती कुबुद्धिरेषा।

अहं करोमीति वृथाभिमानः

स्वकर्मसूत्रे ग्रथितो हि लोकः।।

    सुख या दुख को देने वाला कोई और नहीं है। कोई दूसरा सुख-दुख देता है यह समझना कुबुद्धि है। मैं करता हूँ- यह वृथा अभिमान है, क्योंकि लोग अपने-अपने कर्मों की डोरी से बँधें हुए हैं।

    इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि हमारे द्वारा पूर्व में किये हुए ही संचित कर्म हमारे सामने प्रारब्ध (सुख-दुख) के फल रुप में आ रहे हैं, दूसरा तो केवल उसमें निमित्त बन कर आ गया है। अतः उससे हम क्यों द्वेष या वैरभाव रखें।

    उपर्युक्त लक्षणों से युक्त पुरुष भगवान को प्राप्त हो जाता हैऐसा भगवान ने कहा है। हमें भी भगवान द्वारा बतलाये गए मार्ग पर चलने का प्रयास करते रहना चाहिएअपने सभी कर्म भगवान को अर्पण बुद्धि से करने का प्रयास करें उनमें आसक्ति न रखेंभगवान के द्वारा दिये गये कर्म को उन्हीं के द्वारा दिये गये शरीर और इन्द्रियों द्वारा, उन्हीं की प्रसन्नता के लिए, पूर्ण निष्काम भाव से, कर्तापन के अभिमान से रहित होकरकोई फल की इच्छा या कामना न रखते हुएलोकहित की दृष्टि से करते रहें उससे हमारा अन्तःकरण शुद्ध होकर हमें आत्मज्ञान प्राप्त होगाजिससे हम संसार के आवागमन से मुक्त हो जायेंगें।

 

                                                                             धन्यवाद

  डॉ. बी. के. शर्मा