Thursday, July 23, 2020

मनुष्य के व्यक्तित्व पर गुणों का प्रभाव - दिनांक- 23.07.2020


व्यावहारिक गीता ज्ञान                  

संसार में सभी मनुष्यों का स्वभाव, व्यवहार और उनका व्यक्तित्व अलग-अलग होता है। यह सब प्रकृति से उत्पन्न सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण अर्थात प्रकृति का त्रिगुणात्मक माया से प्रभावित होता है। जिस मनुष्य में जिस गुण की अधिकता होती है उसका वैसा ही स्वभाव, व्यवहार, विचार करने और निर्णय लेने का तरीका आदि होता है। इसलिए संसार में अच्छे और बुरे, शांत और क्रोधित या हिंसात्मक प्रवृति के मनुष्य अपने गुणों के आधार पर होते हैं। प्रत्येक मनुष्य अपने अंदर के गुणों को पहचान कर उन्हें बदलने का प्रयास करके अपना स्वभाव या व्यवहार आदि में परिर्वतन करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। भगवान ने गीता के श्लोक 18/40 में कहा है-


    न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
    सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्रिभिर्गुणैः।।


    पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्व (सभी प्रकार के प्राणी और समस्त पदार्थ) नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो।
  

  श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादशस्कंध में भी भगवान श्री कृष्ण उद्धव जी से कहते हैं कि वस्तु, स्थान (देश), फल, काल, ज्ञान, कर्म, कर्ता, श्रद्धा, अवस्था, देव, मनुष्य त्रियगादि शरीर और निष्ठा-सभी त्रिगुणात्मक हैं। पुरुष और प्रकृति के आश्रित जितने भी भाव हैं- सभी गुणमय हैं- वे चाहे नेत्रादि इन्द्रियों से अनुभव किये हुए हों, शास्त्रों के द्वारा लोक-लोकान्तर के संबंध में सुने गये हों अथवा बुद्धि के द्वारा सोचे-विचारे गये हों। जीव को जितनी भी योनियाँ अथवा गतियाँ प्राप्त होती हैं वे सब इनके गुणों और कर्मों के अनुसार ही होती हैं। सब के सब गुण चित्त से ही संबंध रखते हैं, इसलिए जीव उन्हें अनायास ही जीत सकता है।
    

हमारा स्थूल शरीर जो कि 23 तत्वों (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत, पाँच इन्द्रियों के विषय तथा मन, बुद्धि, अहंकार) का पिण्ड है वह भी प्रकृति से उत्पन्न होने वाले तीनों गुणों का ही कार्य है। गुणों के कार्य इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि ही गुणों के कार्यरुप इन्द्रियों के विषयों में बरत रहे हैं अतः गुण ही गुणों को बरत रहे हैं। इसलिए हमारे व्यवहार, स्वभाव, कर्म आदि का गुणों से प्रभावित होना स्वभाविक ही है। भगवान गीता के श्लोक 14/19 में कहते हैं-


  नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
    गुणेभ्यच्श्र परं वेत्ति मदभावं सोऽधिगच्छति।।
  

  जिस समय द्रष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों के अत्यन्त परे मुझ परमात्मा को तत्व से जानता है उस समय वह मेरे स्वरुप को प्राप्त होता है।
   

प्रत्येक मनुष्य में अलग अलग गुणों का प्रकाश होता है। उनके कारण प्राणियों के स्वभाव में भी भेद हो जाता है। शंकर भाष्य में आता है कि प्राणियों के जन्मान्तर में किए हुए कर्मों के संस्कारजो वर्तमान जन्म में अपने कार्य के अभिमुख होकर व्यक्त हुए हैंउनका नाम स्वभाव है। ऐसा स्वभाव जिन गुणों को उत्पत्ति का कारण हैवे स्वभावप्रभवगुण है। गुणों का प्रादुर्भाव बिना कारण के नहीं बन सकताइसलिए स्वभाव उनकी उत्पत्ति का कारण है। इस प्रकार स्वभाव से उत्पन्न हुएअर्थात प्रकृति से उत्पन्न हुए सत्वरजतम-इन तीनों गुणों द्वारा अपने अपने कार्य के अनुरूप शमादि कर्म विभक्त किए गए हैं। गीता के श्लोक 14/में भगवान कहते हैं कि सत्वगुणरजोगुण और तमोगुण यह प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं।
    

मनुष्य को अपने अंदर मौजूद गुणों की पहचान करने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए क्योंकि सब के सब गुण उसके चित्त से ही संबंध रखते हैं और एक गुण की भी अधिकता या न्यूनता से उसके स्वभाव या व्यवहार में परिवर्तन आ सकता है। अब प्रश्न उठता है कि गुणों के आधार पर मनुष्य को कैसे पहचाना जाए या मनुष्य अपने अंदर के गुणों को कैसे विश्लेषण करें और एक गुण को दबा कर दूसरे गुण को कैसे बढ़ाए ताकि उसका स्वभाव अच्छा बन जाए और उसका उद्धार हो सके।


    श्रीमद्भागवत के एकादश स्कंध में आता है कि भगवान श्री कृष्ण उद्धव जी से कहते हैं कि मानसिक शांति और जितेंद्रियता आदि गुणों से सात्विक पुरुष कीकामना आदि से रजोगुण पुरुष की और क्रोध-हिंसा आदि से तमोगुण पुरुष की पहचान करें। सत्त्वरज और तम- इन तीनों गुणों का कारण जीव का चित्त है। इन्हीं गुणों के कारण जीव शरीर अथवा धन आदि में आसक्त होकर बंधन में पड़ जाता है। सत्वगुण प्रकाशकनिर्मल और शांत है। जिस समय वह रजोगुण और तमोगुण को दबाकर बढ़ता है उस समय मनुष्य सुखधर्म और ज्ञान आदि का भाजन हो जाता है। रजोगुण भेद बुद्धि का कारण है उसका स्वभाव है आसक्ति और प्रवृत्ति। जिस समय तमोगुण और सत्वगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है उस समय मनुष्य दुखकर्मयश और लक्ष्मी से संपन्न होता है। तमोगुण का स्वरूप है अज्ञान। उसका स्वभाव है आलस्य और बुद्धि की मूढ़ता। जब वह बढ़कर सत्वगुण और रजोगुण को दबा लेता है तब मनुष्य तरह-तरह की आशाएं करता हैशोक-मोह में पड़ जाता हैहिंसा करने लगता है अथवा निद्राआलस्य के वशीभूत होकर पड़ा रहता है। जब चित्त प्रसन्न हो इंद्रियां शांत हो,  देह निर्भय हो और मन में आसक्ति न होतब सत्वगुण की बुद्धि समझनी चाहिए। सत्वगुण भगवान की प्राप्ति का साधन है। जब काम करते-करते जीव की बुद्धि चंचलइंद्रियां असंतुष्टकर्मेंद्रियां विकारयुक्तमन भ्रान्त और शरीर अस्वस्थ हो जाए तब समझना चाहिए कि रजोगुण जोर पकड़ रहा है। जब चित्त ज्ञानेंद्रियां के द्वारा शब्दादि विषयों को ठीक-ठाक समझने में असमर्थ हो जाए और खिन्न होकर लीन होने लगेमन सूना सा हो जाए तथा अज्ञान और ओर विषाद की वृद्धि हो तब समझना चाहिए कि तमोगुण वृद्धि पर है। अतः हम अपने गुणों को पहचान कर जो कि हमारे ही चित्त से संबंध रखते हैं अपनी बुद्धि और विवेक द्वारा रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण की वृद्धि करके अपने स्वभाव और अपने दैनिक व्यवहार में परिवर्तन कर सकते हैं। लेकिन ये सब हमें स्वयं के प्रयास द्वारा ही करना पड़ेगा। शास्त्र या विवेकी पुरुष तो केवल मार्ग ही बतला सकते हैंचलना तो स्वयं को ही पड़ेगा।


  
    भगवान गीता के श्लोक 14 /14-15 में कहते हैं कि जब यह मनुष्य सत्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है तब वह उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है। रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है, तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़ योनियों में उत्पन्न होता है। अतः हमारे अंदर मौजूद यह गुण ही हमारे वर्तमान शरीर और भविष्य के शरीर की उत्पत्ति के कारण हैं। इसलिए हमें बहुत ही गंभीरता के साथ अपने अंदर मौजूद गुणों का आंकलन करते रहना चाहिए और रजोगुण एवं तमोगुण को दबाकर सत्वगुण को निरंतर बढ़ाते रहने का प्रयास करते रहना चाहिए इससे हमारे वर्तमान शरीर द्वारा हमारा व्यवहार भी दूसरों के साथ एवं स्वयं के साथ बदल जाएगा और भविष्य भी सुधर जाएगा। यदि इस शरीर में रहते हुए आज के युग में संभव हो सके तब चित्तवृत्तियों को शांत करके निरपेक्षता के द्वारा सत्त्वगुण पर भी विजय प्राप्त कर ले। इस प्रकार गुणों से मुक्त होकर अर्थात गुणातीत होकर अपने जीवभाव को छोड़ देता है और मुक्त होकर भगवान से एक हो जाता है जो कि मनुष्य का अंतिम लक्ष्य है। 

  



धन्यवाद
              डॉ. बी. के. शर्मा




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