Friday, May 15, 2020

कर्म बंधन से मुक्ति - दिनांक 11 मई 2020

व्यावहारिक गीता ज्ञान    

  🌷भगवान गीता के ज्ञान कर्म सन्यास योग नामक चौथे अध्याय के श्लोक 14 में कर्म बंधन से मुक्त होने के विषय में कहते हैं:

 न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।। 🌈


       कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है,  इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते।  इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है,  वह भी कर्मों से नहीं बंधता।

      चतु:श्लोकी भागवत के पहले ही श्लोक में भगवान कहते हैं कि इस सृष्टि के पूर्व में केवल में था। मेरे सिवा कुछ भी नहीं था, न सत और न असत (यानी न कार्य न कारण), इस सृष्टि में भी मैं ही हूं और सृष्टि के लय के बाद भी जो बचेगा वही मैं हूं । अतः:  सृष्टि के पूर्व में, वर्तमान में और अंत में भगवान ही भगवान हैं, उनके अतिरिक्त कुछ नहीं हैं,  वही निमित्त और उपादान कारण हैं।

    इसी प्रकार भगवान गीता के श्लोक 10/20 में कहते हैं कि मैं सब भूतों के हृदय में स्थित उनका आत्मा हूं तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूं। अतः सभी कुछ भगवान का ही स्वरूप है। जगत में होने वाली सभी क्रियाएं, भगवान की ही लीला है।  उपनिषद में आता है कि भगवान ने सोचा कि अब खेलना है तो अकेले में खेल होता नहीं, 💦"एकाकी न रमते" तो 💦"एको-हं- बहुश्याम" एक ही बहुत बन जाएं और एक से बहुत  बन गए।

    उपरोक्त श्लोक में भगवान यही कहते हैं कि कर्मों के फल रुप किसी भी भोग में मेरी जरा भी स्पृहा नहीं है----अर्थात मुझे किसी भी वस्तु की कुछ भी अपेक्षा नहीं है इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। भगवान कहते हैं कि इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है वह भी कर्मों से नहीं बंधता।

      भगवान ने हम मनुष्यों को भी श्लोक 4/27 में  कहा है कि संपूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं तो भी जिसका अंतःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है,  ऐसा अज्ञानी   🌿"मैं कर्ता हूं"🌞 ऐसा मानता है । अतः यदि हम अपने कर्म, ममता, आसक्ति, फल की इच्छा, कर्तापन के अहंकार के साथ करेंगे तब हमारे द्वारा किए गए कार्य संस्कार रूप में हमारे अंतःकरण में संचित हो जाते हैं और वह हमें प्रारब्ध रूप में जन्म- मरण  होते हुए भोगते रहने पड़ेंगे। 🐤 इसलिए भगवान ने गीता के श्लोक 3/19  में कहा है कि तू निरंतर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म को  भली-भांति करता रहे ।  क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है, अर्थात परम तत्व को जानकर कर्म बंधन से मुक्त हो जाता है।🌥

         🙏 धन्यवाद     
           बी.के .शर्मा️

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