Thursday, May 28, 2020

मनुष्य का अपने स्तर (स्थिति)से पतन होने का कारण - दिनांक 25 मई 2020

व्यावहारिक गीता ज्ञान

     🌹भगवान गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 62-63 में मनुष्य का अपनी स्थिति से नीचे गिर जाना या उसके पतन के कारण के विषय में कहते हैं:-

🌞 ध्यायतो विषयान पुंस: संडगस्तेषूपजायते।
       सङगात्सजायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते ।।
       क्रोधाद्भवति  सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:।
       स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।🌞

    🌹विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ती हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पढ़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से अत्यंत मूढ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढभाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थित से गिर जाता है।

   🌹भगवान ने मनुष्य के पतन होने के या उसका अपने स्तर से नीचे गिरने के सात कारण बताये हैं।  जिसमें से पहला कारण बहुत ही महत्वपूर्ण हैं और यही बाकी अन्य के लिए जिम्मेदार भी है, यदि हम इसी को अपने अभ्यास द्वारा ठीक कर ले तब बाकी कारण अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं। अतः हमें मूल कारण पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखना चाहिए। सात कारण निम्न प्रकार से हैं:-

१. मनुष्य का अपने मनद्वारा संसार के विषयों का चिंतन करते रहना जिनमें से अधिकतर निरर्थक ही होते हैं, जिन से बचा जा सकता है।

२. विषयों का चिंतन करने से उनमें आसक्ती या राग का पैदा हो जाना।

३. आसक्ती या राग होने से उन विषयों को भोगने की कामना या इच्छा पैदा हो जाना।

४. यदि उन विषयों को भोगने की हमारी इच्छा पूरी हो गई तब तो ठीक है उसके बाद ओर इच्छा होगी क्योंकि इच्छाएं कभी भी समाप्त नहीं होती। एक के पूरा  होने से पहले ही दूसरी पैदा हो जाती है। यदि किसी कारण हमारी इच्छा पूरी नहीं होती तब हमें क्रोध आता है।

५. हमारे अंदर क्रोध उत्पन्न होने के बाद मूढभाव उत्पन्न हो जाता है, उस समय हम ठीक से सोच विचार नहीं कर पाते और कुछ भी अनर्थ कर देते हैं जिससे बाद में पछताना पड़ता है। क्रोध के कारण हमारी मानसिक स्थिति भी कुछ समय के लिए हमारे वश में नहीं रहती।

६. मूढभाव से स्मृति में भ्रम पैदा हो जाता है अर्थात हमारी स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है, उस समय हमारा ज्ञान भी नष्ट हो जाता है, किसी को भी चाहे वह अपने से बड़ा हो या कोई भी हो उसको भला-बुरा बोल देते हैं।

७. स्मृति भ्रम से हमारी बुद्धि नष्ट हो जाती है । कभी-कभी हम देखते भी हैं कि बड़ा बुद्धिमान मनुष्य भी ऐसी स्थिति आने पर अनुचित कार्य कर बैठता है। जिसकी उससे कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। उस समय उसको अपने कर्तव्य और अकर्तव्य का भी ज्ञान नहीं रहता।

      🌹अंत में बुद्धि या ज्ञान शक्ति का नाश हो जाने पर मनुष्य का पतन हो जाता है अर्थात वह अपने स्तर या स्थिति से गिर जाता है। हम आज देखते भी हैं कि किसी मनुष्य का समाज में बहुत अच्छा स्थान है सभी उसका आदर करते हैं लेकिन कुछ समय बाद पता चलता  है कि उससे कोई ऐसा कार्य हो गया कि वह तो जेल चला जगह और बहुत ही अनुचित कार्य कर बैठा। बाद में वह स्वयं ही पछताता होगा।

     🌹यदि हम इस सबके मूल में जाएं तब देखते हैं कि केवल हमारे मन द्वारा संसार के विषयों या पदार्थों का लगातार चिंतन करते रहना ही है। मन का तो काम ही संकल्प-विकल्प करना है। जिसने अपने मन को वश में कर लिया या जीत लिया उसने तो समझो संसार को ही जीत लिया। मन ही हमारा मित्र है यदि सही चिंतन करता है और यही हमारा शत्रु है यदि चिंतन ठीक नहीं करता। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। अभ्यास के द्वारा मन को बुद्धि और विवेक से उचित दिशा में ले जा सकते हैं। भगवान ने तो गीता के श्लोक १२/८ में कहा है कि मुझ में मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा, इसके उपरांत तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। अतः  जब जब हमारा मन संसार के विषयों का फालतू चिंतन करे तब तब उसे रोक कर परमात्मा के नाम में लगा दें। उपनिषद में शरीर को रथ कहां है, जिसमें हमारी इंद्रियां घोड़े हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथी है, और जीव (हम) उस रथ में सवार होकर इस संसार की यात्रा कर रहा है। अतः मन रूपी लगाम को अपने बुद्धि रूपी सारथी द्वारा वश में रखना चाहिए, अन्यथा हमारी इंद्रिय रूपी घोड़े हमारे शरीर रूपी रथ को गलत दिशा में ले जाकर हमारा पतन कर देंगे और हमें अपनी स्थिति से गिरा देंगे।इसलिए हमें अभ्यास द्वारा मन को बस में रखकर अपना चिंतन ठीक करते रहने का प्रयास करते रहना चाहिए, इसी से हमारा कल्याण संभव है। हम जो भी कार्य करते हों, चाहे विद्यार्थी हों,  व्यापारी हों या कहीं नौकरी करते हों, अपना कार्य पूरे मन से करें , उसे कहीं और भटकने ना दें । उस कार्य से मुक्त होने के बाद मन से ईश्वर का चिंतन कर सकते हैं , शास्त्रों का अध्ययन कर सकते हैं। अपने मन का निरीक्षण करते रहे कि वह कहां जा रहा है इसे उधर से हटाकर ठीक चिंतन में लगाकर रखें। मन के गलत चिंतन होने के कारण कि हम अपने स्तर से गिर सकते हैं और इसे उचित दिशा में लगाकर अपना इस संसार से उद्धार भी कर सकते हैं। 

     
        धन्यवाद
        🌿बी.के. शर्मा

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