Monday, May 4, 2020

सात्विक कर्ता - दिनांक 2 मई 2020

व्यवहारिक गीता ज्ञान

भगवान ने गीता के मोक्ष सन्यास योग नामक 18 वें अध्याय के 26 वें श्लोक में सात्विक कर्ता के विषय में कहा है कि:-

🌷मुक्तसंगोडनहवादी धृत्यूत्साहसमन्वित:।
सिद्धियसिद्धियोर्निविकार: कर्ता सात्विक उच्यते ।। 🌷

जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष- शोकादि विकारों से रहित है-वह सात्विक कहा जाता है।

इससे पूर्व भगवान ने गीता के श्लोक 18 /23 में सात्विक कर्म के विषय में कहा कि जो कर्म शास्त्र विधि से नियत किया हुआ और करता पन के अहिमान से रहित हो तथा फल ना चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग द्वेष के किया गया हो इसके अतिरिक्त सात्विक त्याग के विषय में भगवान श्लोक 18/9 में कहते हैं कि जो शास्त्र विधि कर्म करना कर्तव्य है इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है और श्लोक 6/1 में कहते हैं कि जो पुरुष कर्मफल का आश्रय ना लेकर करने योग्य कर्म करता है वह सन्यासी तथा योगी है भगवान ने श्लोक 2/48 में कहा कि तू आसक्ती को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि बाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्म कर समत्व ही योग कहलाता है।

भगवान सात्विक कर्म उनको करने की विधि सात्विक त्याग आदि को बतला कर अब इस श्लोक में सात्विक करता के विषय में हमें पांच बातों को ध्यान में रखते हुए अपने अपने कर्तव्य कर्मों को करने के बारे में कहा है-

१.  जो संगरहित हो, अर्थात कर्म करते हुए उसे अपना कर्तव्य कर्म समझकर किसी राग, ममता, फल या भोगों की इच्छा न रखते हुए करना, अर्थात आसक्ति रहित होकर कर्म करना🌷

२. अहंकार के वचन न बोलने वाला, अर्थात अपने अंदर करता पन का कोई अभिमान न रखते हुए अपना कर्म करना; कार्य करने के पश्चात अपनी स्वयं की प्रशंसा करना कि मैंने यह कार्य किया है मैं इसे कर सकता था आदि आदि।  अहंकार पूर्वक किया गया कार्य राजस कर्म बन जाता है।🌷

३. अपने कर्तव्य कर्म को धैर्य पूर्वक करना अर्थात कर्म करते समय विघ्न बाधा आ जाए तब बिना उससे विचलित हुए अपना कर्तव्य कर्म करते रहना🌷

४. अपने कर्तव्य कर्म को पूरे उत्साह के साथ अर्थात पूरा मन और अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ करना 🌷

५. कर्तव्य कर्म करते हुए यदि कार्य हमारे अनुकूल हो गया तब बहुत हर्षित होना और यदि किसी विघ्न बाधा के कारण असफलता मिल गई तब शोक करना जो इन विकारों से रहित हो अर्थात निर्विकार रूप से कर्म करता हो यदि अंत:करण में कुछ हर्ष या शोक आ भी जाए तव वह बहुत लंबे समय तक ना रह कर अपनी पूर्व स्थिति में ही यथाशीघ्र स्थित हो जाए। मन में लिए ही ना रहे ताकि शोक के कारण बीमार ना हो जाए या बहुत हर्ष के कारण अपनी स्थिति में ना रहे अर्थात दोनों परिस्थिति में समान भाव रखने की कोशिश करें अभ्यास से इसमें सफलता मिल जाती है।🌷

भगवान द्वारा गीता में सात्विक कर्म सात्विक त्याग और सात्विक कर्ता के विषय मेंबतलाये हुए रास्ते पर हमें चलने का प्रयास करते हुए अपने कर्तव्य कर्म करने चाहिए ताकि हम कर्म करते हुए कर्म बंधन से मुक्त हो सकें । स्वामी रामसुखदास जी ने अपनी पुस्तक सत्संग के फूल में कहा है कि गीता अलौकिक ग्रंथ है इसके समान भी कोई ग्रंथ नहीं है वेदों का सार उपनिषद हैं और उपनिषदों का सार गीता है इस प्रकार गीता परंपरा से तो श्रेष्ठ है ही इसकी अपनी भी एक विलक्षणता है गीता बहुत ही अगाध ग्रंथ है यदि मनुष्य गीता के अनुसार कार्य करें तो उसके सब कार्य साधन हो जाएंगे गीता के अनुसार व्यवहार करते हुए परमार्थ की सिद्धी हो जाती है।🌷

🙏धन्यवाद🙏
बी॰ के० शर्मा 🌷

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