Sunday, May 3, 2020

मन को समभाव में स्थित रखकर कर्म करना - दिनांक 26 अप्रैल 2020

व्यावहारिक गीता ज्ञान 

   🌈🎊  भगवान गीता के कर्म सन्यास योग नामक पांचवें अध्याय के 19 वें  श्लोक में कहते हैं कि:-

🎊🌷 इहैव तैर्जित: सगों येषां साम्ये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिता:।। 🎊🌈
 
   जिनका मन संमभाव में स्थित है , उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही संपूर्ण संसार जीत लिया गया है, क्योंकि परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे  ब्रह्म में ही स्थित है।

    🌈🌈भगवान ने गीता के २/४८ श्लोक में कहा है कि समत्वम योग उच्यते अर्थात अंतः करण में समान भाव रखते हुए ही कर्म करना है। इस श्लोक में भगवान कहते हैं कि जिन मनुष्यों का मन संमभाव  में स्थित है, अर्थात जो हर्ष -शोक, सुख-दुख,जीत -हार, निंदा-स्तुति, शत्रु-मित्र, मान-अपमान आदि द्वंदों से रहित हैं वह अपने वास्तविक स्वरूप अर्थात परमात्मा (परमतत्व) में ही स्थित है, क्योंकि परमात्मा निर्दोष और सम है । अतः समता की प्राप्ति को ही गीता मनुष्य जन्म की पूर्णता मानती है।

  🌈🌈 जब तक हम केवल अपने सुख के ही  विषय में सोचते हैं और इच्छा करते हैं ,चाहे दूसरे को इससे कष्ट या दुख हो रहा है, तब तक हम में समता नहीं आ सकती। दूसरों के कष्ट या दुख को अपने ही समान समझकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूर करने का हमें प्रयास करना चाहिए । हमारे कार्यों या व्यवहार से दूसरों को सुख पहुंचे और कोई कष्ट ना हो यही हमारा उद्देश्य होना चाहिए । समाज में रहते हुए हमारा व्यवहार तो अलग अलग तरीके से अन्य लोगों के साथ हो सकता है क्योंकि समान व्यवहार नहीं हो सकता किंतु हमारे अंत:करण में समान भाव की सबके अंदर एक ही परमात्मा है को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए । उदाहरण के लिए जैसे हमारे ही शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में मस्तक ,हाथ, पैर आदि में हमारी समान दृष्टि है लेकिन व्यवहार में समानता नहीं हो सकती ,हम अपने ही पैर छूकर कभी हाथ धोते हैं या किसी को लग जाए तब क्षमा मांगते हैं लेकिन हाथ या मस्तक के साथ ऐसा नहीं सोचते। लेकिन सभी अपने अंगों का समान रूप से ध्यान रखते हैं और किसी को भी कष्ट होने पर हमारे अंतःकरण में समान भाव या दुख होता है। उसी तरह से समाज में या ऑफिस या व्यापार में कार्य करते समय अन्य के साथ  हम व्यवहार तो अलग अलग तरीके से ही करते हैं लेकिन अंतःकरण में उन सभी के हित में विचार कर सकते हैं। हमारे जानने वालों में यदि किसी को दुख है तब हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसे दूर करने का  प्रयास अवश्य करते रहना चाहिए ।  क्योंकि शरीर की स्थिति पर हम अलग-अलग हैं किंतु चेतन तत्व तो सबमें  एक ही है जैसे अलग-अलग यंत्र होते हुए भी सभी में उनको चलाने वाली बिजली तो एक ही है । अतः हमारी दृष्टि जड़ पदार्थ (शरीर ) पर न रखते हुए उस में स्थित चेतन तत्व ( परमात्मा )पर ही रहनी चाहिए तभी हम समता क़ो प्राप्त हो सकते हैं । भगवान शंकराचार्य तत्वोपदेश  में कहते हैं - भावाद्बैतं सदा कुर्यात क्रियाद्बैतं न कुत्रचित ।  भाव में ही सदा अद्वैत (समान भाव) होना चाहिए, क्रिया (व्यवहार) में कहीं नहीं ।🎊🌈👑

🙏धन्यवाद🙏
       बी .के .शर्मा

No comments:

Post a Comment